
यह आलेख मंदिर, आस्था और सनातन धर्म की मूल भावना पर विचार करता है। लेखक का मत है कि मंदिर जाना तभी सार्थक है, जब उससे व्यक्ति के आचरण, नैतिकता और जीवन-शैली में सकारात्मक परिवर्तन आए।
- मंदिर, ऊर्जा और आत्मिक परिवर्तन
- सनातन धर्म का संदेश: भीतर का शुद्धिकरण
- पूजा से पहले आत्मसुधार की आवश्यकता
- भीड़ नहीं, बदलाव चाहिए
कंचन काया राम की, नयन कमल समान।
दर्शन करती दुनिया, करती प्रभु को प्रणाम।।
आशी प्रतिभा
मूर्तिकार ने जब यह मूर्ति बनाई, तब उसका स्वरूप उसे इस प्रकार का बिल्कुल नहीं लगा, जैसे उसमें कोई ऊर्जा समाहित हो। परंतु प्राण-प्रतिष्ठा के बाद राम का स्वरूप और निखार एकदम से अलग हो गया। हमारे वेद-मंत्रों से निकलने वाली ऊर्जा बहुत ही सकारात्मक होती है, जो पत्थर में भी प्राण फूँक दे। यही सनातन धर्म की शक्ति है। वह स्वयं इतना सकारात्मक है कि सभी को स्वीकार करते हुए अपना अस्तित्व बनाए रखता है।
परंतु आज प्रश्न यह उठता है कि हम जिस सनातन धर्म को मानते हैं, उसके मंदिर-प्रांगण में, जहाँ हम प्रभु रूपी अपने इष्ट को नमन करते हैं और पूजन करते हैं, क्या वहाँ से हम उस ऊर्जा को अपने साथ बनाए रखते हैं?
लोग आज भी नशा करते हैं, बड़ी मात्रा में पाप करते हैं, फिर भी मंदिर जाते हैं। परंतु क्या यह उचित है कि हम ऐसे द्वेष और बुराइयों के साथ मंदिर जाना-आना जारी रखें? यदि हम मंदिर जाते हैं, तो हमें भी वहाँ से सद्भाव लेकर आना चाहिए, नशा जैसी बुराइयों को दूर करना चाहिए। यदि हम अनैतिक हैं और मंदिर जाकर भी अपने अंदर बदलाव नहीं ला पा रहे हैं, तो हमारा मंदिर जाना व्यर्थ है। फिर तो मंदिर जाना हमारे लिए सिर्फ भीड़ बढ़ाने के बराबर है।
यह एक ऐसा उद्देश्य बन गया है, जिसमें हम मंदिर-प्रांगण को भी पर्यटन स्थल की तरह देखकर, वहाँ की भीड़ देखकर लौट आना पसंद करते हैं। परंतु मंदिरों का सही उद्देश्य हमारे भीतर उचित बदलाव और नैतिकता का विकास होना चाहिए। समस्त प्रकार की बुराइयों और द्वेष को दूर कर, अच्छी सद्भावनाओं और सकारात्मक ऊर्जा को अपने भीतर धारण करना ही हमारे मंदिर-दर्शन का वास्तविक कारण होना चाहिए।
भगवान की तो हम घर में भी पूजा करते हैं, परंतु मंदिर में निरंतर पूजा-पाठ के चलते एक सकारात्मक ऊर्जा की स्थापना हो जाती है। इस सकारात्मक ऊर्जा को हम अपने भीतर ग्रहण कर, अपने जीवन में भी सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। कहने का अर्थ यह है कि यदि हम मंदिर जाकर भी अपने अंदर कोई परिवर्तन नहीं ला पा रहे हैं, लगातार पाप-कर्म कर रहे हैं और नशे की लत को अपना रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं हम अनुशासन का उल्लंघन कर रहे हैं, जिसकी अनुमति हमारा सनातन धर्म भी नहीं देता।
हमें अपने इष्ट को प्राप्त करने और मंदिर-प्रांगण में जाने के लिए स्वयं को भी बदलना होगा। यदि हम सनातन धर्म को मानते हैं, तो हमें हर प्रकार के नशे से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए और नैतिक जीवन अपनाना चाहिए।
@आशी प्रतिभा (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत








