
आज आम जनमानस की दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा है कि क्या मोदी सरकार डरपोक सरकार है? क्योंकि पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की प्रस्तावित पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में दर्ज पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला प्रकरण ने संसद से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल मचा दी है। राहुल गांधी द्वारा संसद में इस पुस्तक के अंश पढ़े जाने पर सत्ता पक्ष के विरोध और सदन के स्थगन ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सैन्य निर्णयों से जुड़े सच सार्वजनिक होने से रोके जा रहे हैं।
- जब टैंक बढ़े और आदेश रुके
- रेचिन ला से संसद तक: एक किताब का सफर
- सैन्य फैसला या राजनीतिक जिम्मेदारी?
- अप्रकाशित किताब और उजागर होती असहजता
राज शेखर भट्ट
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में वर्णित एक रात—31 अगस्त 2020—आज भारतीय राजनीति और सुरक्षा विमर्श के केंद्र में है। यह वही रात थी, जब पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला क्षेत्र में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के टैंक भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी तक पहुंच गए थे और हालात तेजी से युद्ध के कगार की ओर बढ़ रहे थे। किताब के अनुसार, उस रात भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के तत्कालीन प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने सेना प्रमुख नरवणे को सूचित किया कि चार चीनी टैंक एक खड़ी पहाड़ी से आगे बढ़ते हुए कैलाश रेंज की ओर आ रहे हैं। यह वही रणनीतिक ऊंचाई थी, जिस पर भारतीय सेना ने कुछ ही घंटे पहले नियंत्रण स्थापित किया था। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के इस संवेदनशील क्षेत्र में ऊंचाई का हर मीटर सामरिक बढ़त तय करता है।
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भारतीय सैनिकों ने चेतावनी स्वरूप इल्यूमिनेटिंग राउंड फायर किया, लेकिन चीनी टैंक नहीं रुके। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से संपर्क साधा। उनका एक ही प्रश्न था—“मेरे लिए आदेश क्या हैं?” किताब के मुताबिक, उस समय लागू प्रोटोकॉल स्पष्ट था—ऊपर से अनुमति मिले बिना गोली नहीं चलाई जा सकती थी। लेकिन ऊपर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आए। समय बीतता रहा। रात 9.10 बजे तक चीनी टैंक दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर आ चुके थे। 9.25 बजे फिर रक्षा मंत्री को फोन किया गया, लेकिन स्थिति जस की तस रही।
इस बीच PLA कमांडर मेजर जनरल लियू लिन का संदेश आया, जिसमें दोनों पक्षों से आगे न बढ़ने और अगले दिन स्थानीय कमांडरों की बैठक का प्रस्ताव था। इसे एक संभावित समाधान के रूप में देखा गया, लेकिन 10 बजे के बाद भी चीनी टैंक आगे बढ़ते रहे और वे महज 500 मीटर की दूरी पर पहुंच गए। लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने साफ कहा कि चीनी टैंकों को रोकने का एकमात्र तरीका भारतीय मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग था, जो पूरी तरह तैयार थी। पाकिस्तान के साथ एलओसी पर ऐसी फायरिंग के अधिकार निचले स्तर तक होते हैं, लेकिन चीन के मामले में एक भी आर्टिलरी राउंड हालात को युद्ध में बदल सकता था। नरवणे लिखते हैं कि वे एक ओर फील्ड कमांडरों के दबाव में थे, जो कार्रवाई चाहते थे, और दूसरी ओर एक ऐसी सरकारी समिति के बीच फंसे थे, जो स्पष्ट आदेश देने से हिचक रही थी। रात 10.30 बजे रक्षा मंत्री का फोन आया। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर चुके थे।
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प्रधानमंत्री का संदेश संक्षिप्त था—“जो उचित समझो, वह करो।” नरवणे के शब्दों में, यह पूरी तरह सैन्य निर्णय घोषित कर दिया गया, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ने निर्णय लेने से स्वयं को अलग कर लिया। “मुझे एक गर्म आलू पकड़ा दिया गया था और पूरी जिम्मेदारी मेरे कंधों पर थी,” वे लिखते हैं। इसी प्रसंग को लेकर संसद में विवाद खड़ा हुआ, जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक मैगज़ीन में प्रकाशित पुस्तक के टाइपस्क्रिप्ट अंशों को उद्धृत करने की कोशिश की।
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सत्ता पक्ष ने सवाल उठाया कि क्या यह सामग्री औपचारिक रूप से प्रकाशित और प्रमाणित है। हंगामे के बीच सदन स्थगित कर दिया गया। विवाद का एक बड़ा पहलू यह भी है कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पिछले एक वर्ष से अधिक समय से रक्षा मंत्रालय की समीक्षा में अटकी हुई है। अप्रैल 2024 में प्रस्तावित रिलीज़ अब तक नहीं हो सकी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुस्तक में अग्निपथ योजना और चीन के साथ सैन्य-राजनीतिक समन्वय जैसे संवेदनशील विषयों पर खुलासे सरकार को असहज कर रहे हैं। आज यह पुस्तक केवल एक पूर्व सेनाध्यक्ष की आत्मकथा नहीं रह गई है, बल्कि यह उस प्रश्न का प्रतीक बन गई है—संकट की घड़ी में अंतिम निर्णय कौन लेता है, और क्या उस निर्णय से बचना भी एक रणनीति हो सकती है।








