
बसंत ऋतु प्रकृति को नवजीवन देती है, वहीं संत समाज और संस्कृति को नई दिशा देते हैं। लेख में बताया गया है कि जैसे पुराने पत्ते झड़कर नए पत्ते आते हैं, वैसे ही मन के विकार त्यागकर सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। सच्चे संत अपने विचारों से समाज में सुधार और जीवन में आनंद का संचार करते हैं।
- बसंत और संत: जीवन परिवर्तन का संदेश
- प्रकृति का नवसृजन और संस्कृति का परिष्कार
- संतों के विचार और समाज का उत्थान
- सकारात्मक सोच से जीवन में बसंत
सुनील कुमार माथुर
कहते हैं कि बसंत और संत दोनों में एक ही समानता है। बसंत जब आता है तो प्रकृति सुधर जाती है और जब संत आते हैं तो संस्कृति सुधर जाती है। बसंत ऋतु जब आती है तब वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और उन पर नए पत्ते आते हैं। ठीक उसी प्रकार हमें भी अपने मन के विकारों को मिटाकर मन में सकारात्मक सोच के साथ बदलाव लाना चाहिए और जब भी कोई कार्य करें, तब अपनी ओर से बेहतर ही करें, ताकि कहीं भी शक-संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। जहाँ मन साफ होता है, वहाँ किसी भी प्रकार के संदेह का कूड़ा-करकट नहीं रहता है।
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ठीक उसी प्रकार समाज में जब सच्चे संतों का आगमन होता है, तब हमारी संस्कृति में व्यापक सुधार हो जाता है, क्योंकि उनके विचार, चिंतन-मनन शक्ति और बात करने का तरीका ऐसा होता है कि वे बुरे से बुरे व्यक्ति के हृदय को भी परिवर्तित कर देते हैं। सच्चे साधु-संत न केवल दुनिया को अपने प्रवचनों के माध्यम से ज्ञान ही देते हैं, अपितु समाज को एक नई सोच और सही राह भी दिखाते हैं। जो लोग सकारात्मक सोच के साथ कार्य करते हैं, उनका जीवन आनंददायक हो जाता है और वे सदैव खुशहाली के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।
इसलिए जीवन में बसंत का और साधु-संतों का आगमन नितांत आवश्यक है। बसंत के आगमन से जीवन में नए रक्त का संचार होता है और नई ऊर्जा प्राप्त होती है। ठीक उसी प्रकार सच्चे संतों के आगमन से हमारे मन और मस्तिष्क में नए विचारों का आगमन होता है, जिसके माध्यम से हम हर कार्य बिना किसी बाधा के आसानी से संपादित कर लेते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान








Nice
बहुत ही समसामयिक व ज्ञानवर्धक आलेख ।
Right👍