
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 से अब तक किए गए गारंटी वाले वादों पर विपक्ष और आम जनता सवाल उठा रही है। वायरल हो रहे एक वीडियो में एक युवती ने सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, महंगाई और अधूरी योजनाओं को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं। लोकतंत्र में सवाल पूछने को गाली बताने की मानसिकता पर भी गंभीर बहस छिड़ गई है।
- 2014 से 2026 तक: वादों की राजनीति और अधूरे सपने
- वायरल वीडियो में सवाल: क्या सवाल पूछना अब गाली है?
- महंगाई, बेरोजगारी और कर्ज़ में डूबता भारत
- विश्वगुरु के दावे और अधूरी योजनाओं की सच्चाई
राज शेखर भट्ट
देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2014 से ही चुनावी मंचों और जनसभाओं में “गारंटी” शब्द को अपनी राजनीति का सबसे मजबूत हथियार बताते रहे हैं। हर चुनाव में जनता को नई-नई गारंटियाँ दी गईं, लेकिन वर्ष 2026 तक आते-आते इन्हीं गारंटियों की ज़मीनी हकीकत पर सवाल खड़े होने लगे हैं। विपक्ष ही नहीं, अब आम नागरिक भी यह पूछने लगे हैं कि आखिर इन गारंटियों का परिणाम क्या निकला। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े वादों के तहत देशभर में एम्स खोलने की घोषणा की गई थी। लेकिन कई जगहों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद भवन आज भी अधूरे पड़े हैं और पिलरों से आगे निर्माण नहीं बढ़ पाया।
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इसी तरह उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 448 करोड़ रुपये की लागत से बने अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का उद्घाटन बड़े प्रचार के साथ किया गया, लेकिन आज वह एयरपोर्ट लगभग बंद पड़ा है और नियमित उड़ानें नहीं के बराबर हैं।आतंकवाद, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे, जिन पर मोदी सरकार ने निर्णायक कार्रवाई का दावा किया था, वे आज भी जनता की सबसे बड़ी चिंता बने हुए हैं। 2 करोड़ नौकरियों के वादे के विपरीत बेरोजगारों की संख्या में इज़ाफा हुआ है। निजी क्षेत्र में छंटनी और सरकारी नौकरियों में भर्ती की धीमी रफ्तार ने युवाओं के भविष्य को और अधिक अनिश्चित बना दिया है।
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक युवती का बयान वाला वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उसने मोदी सरकार की नीतियों पर सीधे सवाल उठाए हैं। युवती का कहना है कि प्रधानमंत्री यह शिकायत कर रहे हैं कि लोग उनकी रील बनाकर उन्हें गाली देते हैं, लेकिन लोकतंत्र में यदि कोई नागरिक सरकार से सवाल पूछता है, अधूरे वादों पर जवाब मांगता है, तो क्या उसे गाली देना कहा जाएगा? वीडियो में युवती ने महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती ईंधन कीमतों और घरेलू गैस सिलेंडर के दामों का ज़िक्र करते हुए कहा कि जिन मुद्दों पर सरकार ने राहत देने का वादा किया था, उन्हीं मुद्दों पर जनता आज सबसे अधिक परेशान है।
न पेट्रोल-डीजल सस्ता हुआ, न गैस सिलेंडर आम आदमी की पहुंच में आया और न ही रोज़मर्रा की महंगाई पर कोई स्थायी नियंत्रण दिखा। आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार के दावों पर सवाल उठ रहे हैं। देश पर बढ़ते कर्ज़ को लेकर आलोचक कह रहे हैं कि भारत विश्व बैंक से कर्ज़ लेने वाले देशों में शीर्ष पर पहुँच चुका है। ऐसे में “विश्वगुरु” बनने के दावे और वास्तविक आर्थिक हालात के बीच का अंतर और गहरा होता जा रहा है। लोकतंत्र की बुनियादी आत्मा सवाल पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है।
यदि सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की आलोचना करना और वादों का हिसाब मांगना गाली समझा जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। वायरल वीडियो इसी भावना को आवाज़ देता है, जिसे अब देशभर में बहस का विषय बनाया जा रहा है। कुल मिलाकर, 2014 से शुरू हुई “गारंटी की राजनीति” 2026 तक आते-आते जवाबदेही की कसौटी पर खड़ी दिखाई दे रही है। जनता अब नारों से आगे बढ़कर ठोस परिणाम चाहती है और यही सवाल आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे।








