
देहरादून के ईस्टहोपटाउन क्षेत्र में आरक्षित वन भूमि पर निर्माण का गंभीर आरोप सामने आया है। रिटायर सर्वेयर ने इसे पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन बताते हुए मिलीभगत की आशंका जताई है। मामले में 1958 के शासनादेश और 1968 के राजपत्र प्रकाशन का हवाला दिया गया है।
- ईस्टहोपटाउन में आरक्षित वन पर निर्माण का विवाद, 1968 के शासनादेश का हवाला
- पर्यावरण संरक्षण पर सवाल: आरक्षित वन को राजस्व भूमि दिखाने का आरोप
- देहरादून में वन कटान का गंभीर मामला, रिटायर सर्वेयर ने उठाई जांच की मांग
- आरक्षित वन में सड़क–भवन निर्माण का आरोप, वन विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में
सीपी डोभाल
देहरादून (उत्तराखण्ड)
देहरादून। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कार्य करने वाले संगठनों और सरकारी तंत्र की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए एक गंभीर मामला सामने आया है। हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) से जुड़े प्रकरण में आरोप लगाया गया है कि जनपद देहरादून के ग्राम ईस्टहोपटाउन स्थित खसरा नंबर 384 में आरक्षित वन की भूमि पर वन स्वरूप को नष्ट कर भवनों और सड़कों का निर्माण कराया गया। यह आरोप रिटायर सर्वेयर सी. पी. डोभाल ने लगाए हैं, जिन्होंने इसे जनहित का विषय बताते हुए मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक किया है।
Government Advertisement...
उनके अनुसार, खसरा नंबर 384 को वर्ष 2011 में राजस्व भूमि दर्शाते हुए पट्टा अथवा अन्य प्रशासनिक कार्रवाई की गई, जबकि वास्तविकता में यह भूमि आरक्षित वन की श्रेणी में आती है। शिकायतकर्ता के अनुसार, खसरा नंबर 384 का कुल क्षेत्रफल 29.7730 हेक्टेयर (लगभग 73.57 एकड़) है। शासनादेश संख्या 23(3)/203-14-ख-67 एवं विज्ञप्ति संख्या 4926/14 दिनांक 8 अक्टूबर 1958 के तहत इस संपूर्ण भूमि को आरक्षित वन घोषित किया गया था। यह शासनादेश उत्तर प्रदेश शासकीय गजट में 7 सितंबर 1968 को प्रकाशित भी हुआ था। इसके साथ ही वन बंदोबस्त अधिकारी द्वारा जारी मानचित्र में भी यह भूमि आरक्षित वन के रूप में दर्ज है।
शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब एक बार यह भूमि आरक्षित वन घोषित हो चुकी थी, तो इस खसरा नंबर में किसी भी प्रकार का अन्य खातेदार या पट्टा वैधानिक रूप से संभव नहीं था। ऐसे में वर्ष 2011 में इसे राजस्व खाते में दिखाना और निर्माण कार्य की अनुमति दिया जाना, प्रथम दृष्टया पर्यावरण कानूनों और वन अधिनियमों का उल्लंघन प्रतीत होता है। सी. पी. डोभाल का कहना है कि मौके पर जंगल का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया गया है। गूगल मैप और सैटेलाइट चित्रों में भी बड़े पैमाने पर जंगल कटान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
आरोप है कि इतनी बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र का नष्ट होना बिना प्रशासनिक और विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि सभी संसाधनों और तकनीकी सुविधाओं से युक्त वन विभाग के अधिकारियों ने इतने बड़े भू-भाग पर हुए जंगल कटान को कैसे नजरअंदाज किया। यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो आरक्षित वन को इस स्तर पर नुकसान नहीं पहुंचता। शिकायतकर्ता ने इस पूरे प्रकरण को पर्यावरणीय अपराध करार देते हुए निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और आरक्षित वन भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने की मांग की है।
उन्होंने कहा कि यदि आरक्षित वनों को ही इस तरह समाप्त किया जाएगा, तो पर्यावरण संरक्षण की सारी नीतियां कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी। फिलहाल, यह मामला प्रशासन और वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है। अब देखना यह होगा कि शासन स्तर पर इस पर क्या संज्ञान लिया जाता है और आरोपों की जांच के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है।






