
श्रीलंका का इतिहास आदिम मानव से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक की यात्रा है, जिसमें भारतीय, बौद्ध, द्रविड़ और यूरोपीय प्रभाव गहराई से जुड़े हैं। यह द्वीप व्यापार, धर्म, जल प्रबंधन और स्थापत्य की दृष्टि से एशिया की महत्वपूर्ण सभ्यताओं में रहा है। संघर्षों के बावजूद श्रीलंका आज भी सांस्कृतिक लचीलापन और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक है।
- श्रीलंका की प्राचीन सभ्यता और भारतीय संबंध
- बौद्ध धर्म, चोल आक्रमण और सिंहल राजवंश
- औपनिवेशिक काल से स्वतंत्रता तक की यात्रा
- सांस्कृतिक धरोहर, सिगिरिया और पराक्रम समुद्र
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार
समुद्र के गर्भ से निकलता इतिहास—हिंद महासागर की गोद में बसा एक छोटा-सा द्वीप, जिसे भारत का ‘आंसू’ कहा गया, कभी ‘ताम्रपर्णी’ बना, कभी ‘सेलेओ’ तो कभी ‘सीलोन’। आज जिसे हम श्रीलंका कहते हैं, उसका इतिहास मात्र एक देश की कहानी नहीं, बल्कि सभ्यताओं के मिलन, संघर्ष और अटूट मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है। 34,000 साल पुराने आदिम पदचिह्नों से लेकर आधुनिक लोकतंत्र की चुनौतियों तक, श्रीलंका का सफर किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं है।
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श्रीलंका के इतिहास की नींव ‘बालंगोडा मानव’ ने रखी थी। लगभग 34,000 वर्ष पूर्व, मेसोलिथिक युग के ये शिकारी-संग्रहकर्ता इस द्वीप के स्वामी थे। ताज़ा उत्खनन और वैज्ञानिक विश्लेषण एक चौंकाने वाला तथ्य सामने लाते हैं—जहाँ एक ओर यहाँ के आदिम मानवों का संबंध दक्षिण भारत से था, वहीं शुरुआती बसावटों के तार उत्तर भारत के लोगों से भी जुड़े थे। ईसा-पूर्व 15,000 तक यहाँ के लोग खेती (जौ) से परिचित हो चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन मिस्र में ईसा-पूर्व 1500 के आसपास उपलब्ध दालचीनी का मूल स्रोत श्रीलंका ही था। यह इस बात का प्रमाण है कि जब दुनिया के नक्शे बन रहे थे, तब यह द्वीप वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था।
राजकुमार विजय और उत्तर भारतीय संबंध
बौद्ध ग्रंथों ‘दीपवंश’ और ‘महावंश’ के अनुसार, श्रीलंका के शाही इतिहास का प्रारंभ राजकुमार विजय से होता है। दंतकथाओं के अनुसार, एक सिंह (शेर) और राजकुमारी के संयोग से जन्मे वंशज ‘सिंहली’ कहलाए। विजय अपने 700 अनुयायियों के साथ कलिंग (आधुनिक ओडिशा) से यहाँ आए थे। सिंहली भाषा का गुजराती और सिंधी भाषा से गहरा जुड़ाव इस ऐतिहासिक प्रवास की पुष्टि करता है। विजय ने इस द्वीप को ‘ताम्रपर्णी’ नाम दिया, जिसका अर्थ है ‘तांबे के पत्तों जैसी भूमि’। यही नाम आगे चलकर यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी के नक्शों में भी अंकित हुआ।
रामायण और श्रीलंका
भारतीय पौराणिक काव्यों में श्रीलंका को ‘लंका’ के रूप में चित्रित किया गया है। ईसा-पूर्व चौथी से दूसरी सदी के बीच रचित रामायण में इसे राक्षसराज रावण का निवास बताया गया है। आज भी श्रीलंका के नुआरा एलिया की पहाड़ियों में ‘सीता एलिया’ (अशोक वाटिका) और ‘रावण एला’ (झरने और गुफाएँ) जैसे स्थल मौजूद हैं। स्थानीय लोग रावण को केवल एक खलनायक नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और महान चिकित्सक के रूप में पूजते हैं, जिसने ‘हेला’ सभ्यता को ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
धम्म का आगमन: महेंद्र और संघमित्रा
तीसरी सदी ईसा-पूर्व में सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा के आगमन ने श्रीलंका की आत्मा को बदल दिया। राजा देवनमपिया टिस्सा के शासनकाल में बौद्ध धर्म यहाँ पहुँचा। संघमित्रा अपने साथ बोधि वृक्ष की एक शाखा लाईं, जो आज भी अनुराधापुरा में सुरक्षित है। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि वास्तुकला, लिपि और दर्शन के नए युग का सूत्रपात था।
चोल साम्राज्य और सिंहल प्रतिरोध
श्रीलंका का इतिहास दक्षिण भारतीय राजवंशों—चोल, पांड्य और पल्लव—के आक्रमणों से अछूता नहीं रहा। चोल राजा एलारा के न्यायपूर्ण शासन को सिंहल नायक दुत्तु गेमुनु ने समाप्त किया। 10वीं-11वीं शताब्दी में राजराज चोल और राजेंद्र चोल ने पूरे द्वीप पर विजय प्राप्त की। उन्होंने अनुराधापुरा को नष्ट कर पोलोन्नरुवा को राजधानी बनाया और भव्य शिव मंदिरों का निर्माण कराया।
जल प्रबंधन का स्वर्ण युग
12वीं शताब्दी में राजा पराक्रमबाहु प्रथम का उदय हुआ। उन्होंने घोषणा की—“आकाश से गिरने वाली वर्षा की एक भी बूँद बिना उपयोग समुद्र में नहीं जानी चाहिए।” उनके द्वारा निर्मित ‘पराक्रम समुद्र’ आज भी श्रीलंका की कृषि व्यवस्था की रीढ़ है।
औपनिवेशिक ग्रहण और स्वतंत्रता
16वीं शताब्दी में पुर्तगाली, फिर डच और अंततः 1815 में ब्रिटिशों ने पूरे द्वीप पर कब्ज़ा किया। 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका स्वतंत्र हुआ, किंतु स्वतंत्रता के बाद सिंहली-तमिल संघर्ष और लिट्टे के साथ गृहयुद्ध ने देश को गहरे घाव दिए, जो 2009 में समाप्त हुआ।
सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक श्रीलंका
कैंडी का दंत मंदिर, सिगिरिया का सिंह द्वार, पराक्रम समुद्र और एसाला पेराहेरा आज भी श्रीलंका की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हैं। श्रीलंका का इतिहास युद्धों और उपनिवेशवाद से गुज़रा है, पर इसकी असली शक्ति इसकी सांस्कृतिक लचीलापन में निहित है।







