
नैनीताल की एसीजेएम कोर्ट ने हाई कोर्ट को गुमराह करने के आरोप में हरिद्वार के मुस्लिम दंपती को दोषी ठहराते हुए दो-दो साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। मामले में महिला के भाई की गवाही से यह खुलासा हुआ कि उसने पहली शादी छिपाकर दूसरी शादी की थी। कोर्ट ने इसे न्यायालय के साथ गंभीर धोखाधड़ी मानते हुए कड़ा रुख अपनाया।
- पहली शादी छिपाकर दूसरी करने का मामला, नैनीताल कोर्ट का सख्त फैसला
- भाई ने कोर्ट में खोली बहन की पोल, झूठे शपथपत्र की पुष्टि
- सुरक्षा याचिका के नाम पर गलत जानकारी देने पर दंपती दोषी
- झूठे दस्तावेज और शपथपत्र पेश करने पर एसीजेएम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
नैनीताल। न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह करने और हाई कोर्ट में झूठा शपथपत्र प्रस्तुत करने के गंभीर मामले में नैनीताल की अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) रवि रंजन की अदालत ने हरिद्वार निवासी मुस्लिम दंपती को दोषी करार देते हुए दो-दो साल के सश्रम कारावास और प्रत्येक पर पांच-पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। यह फैसला न्यायालय में सत्य और पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है।
सहायक अभियोजन अधिकारी सुमित कन्याल के अनुसार वर्ष 2020 में शाहीन पत्नी शाहरूख और शाहरूख पुत्र अब्दुल रहमान, निवासी लक्कड़ खुर्द, पथरी, जिला हरिद्वार ने हाई कोर्ट में सुरक्षा की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। याचिका में शाहीन ने दावा किया था कि उसने अपनी मर्जी से निकाह किया है और उसके भाई-बंधुओं से जान का खतरा है। याचिका के समर्थन में दंपती ने शपथपत्र प्रस्तुत कर यह भी कहा था कि यह शाहीन का पहला निकाह है।
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हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया तथ्यों के आधार पर पुलिस सुरक्षा के निर्देश दिए थे। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान महिला के भाई जैद ने कोर्ट में बयान देकर सनसनीखेज खुलासा किया। उसने बताया कि शाहीन की पहली शादी 17 मार्च 2019 को मोहम्मद साजिद के साथ हो चुकी थी और आज तक विधिवत तलाक नहीं हुआ है। इसके बावजूद शाहीन ने शाहरूख के साथ दूसरा निकाह कर लिया और हाई कोर्ट में गलत तथ्यों पर आधारित शपथपत्र दाखिल किया।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान शाहीन ने स्वीकार किया कि उसकी पहली शादी हुई थी, लेकिन उसने आपसी सुलह के आधार पर विवाह विच्छेद की बात कही। हालांकि, तलाक की प्रक्रिया, समय और कारण का कोई ठोस प्रमाण या उल्लेख याचिका में नहीं किया गया। अदालत ने माना कि आरोपितों ने जानबूझकर तथ्य छिपाकर और झूठे शपथपत्र के माध्यम से हाई कोर्ट को गुमराह किया। हाई कोर्ट के निर्देश पर इस मामले में धारा 193 (झूठा साक्ष्य और शपथपत्र देना) के तहत संज्ञान लिया गया।
हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार न्यायिक की ओर से 11 दिसंबर 2020 को सीजेएम कोर्ट नैनीताल में परिवाद दायर किया गया, जिसे बाद में एसीजेएम कोर्ट में स्थानांतरित किया गया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि न्यायालय को गुमराह करना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रहार करता है। इसलिए आरोपितों को सख्त सजा देना आवश्यक है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है।





