
यह रचना बसंत ऋतु के आगमन के साथ माँ सरस्वती की वंदना करती है, जहाँ ज्ञान, कला और संगीत के माध्यम से सद्बुद्धि, सद्मार्ग और मानवता के विकास की कामना की गई है। कविता जीवन के सुख-दुःख, पतझड़ और बसंत के प्रतीकों से आशा, विवेक और सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देती है।
- वीणावादनी की वंदना
- बसंत की पीतांबरी धरा
- ज्ञान, कला और संगीत का आह्वान
- मानवता और सद्गुणों की पुकार
भुवन बिष्ट
रानीखेत (उत्तराखंड)
Government Advertisement...
पीतांबर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।।
जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।
सद्बुद्धि सद्मार्ग मिले।
कृपा मातेश्वरी तुम्हारी।।
ज्ञान का मन में हो संचार।
मिटे अशिक्षा अत्याचार।।
राग-द्वेष से मुक्त हो जग।
बहे प्यार, खुशियों की धार।।
पीतांबर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।।
जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।
ज्ञान, कला, संगीत की।
माता भरती हो भंडार।।
खेत-खलिहानों ने भी ओढ़ी।
नयनाभिराम हैं पुष्प सुगंधित।।
रंग-बिरंगी धरा पीतांबरी।
मन में भी जागे संचार।।
पीतांबर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।।
सुख-दुःख का यह ज्ञान कराता।
पतझड़ बित, बसंत आ जाता।।
ज्ञान के चक्षु खुल जाएँ।
मानव, मानवता दिखलाएँ।।
मानव के हृदय में जगा दे।
सद्गुण, साहस, सुविचार।।
पीतांबर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।।
जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।







