
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिए गए बयान ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। महिला सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े उनके वक्तव्य को लेकर समर्थक और विरोधी आमने-सामने हैं। सोशल मीडिया पर यह बयान तेजी से वायरल हो रहा है।
- महिला सम्मान और सत्ता की जिम्मेदारी पर शंकराचार्य का सवाल
- प्रधानमंत्री के विवाह को लेकर टिप्पणी ने बढ़ाया विवाद
- धार्मिक संत के बयान पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में प्रतिक्रिया
- सोशल मीडिया पर वायरल हुआ अविमुक्तेश्वरानन्द का वक्तव्य
राज शेखर भट्ट
देहरादून। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक तीखा और चर्चित बयान देकर देशभर में बहस को जन्म दे दिया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि “जो व्यक्ति महिला की इज्जत करना नहीं जानता, उसे जनता ने देश का प्रधानमंत्री बना दिया”। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री के विवाह और निजी जीवन से जुड़े विषयों पर भी खुलकर टिप्पणी की। यह बयान सामने आते ही राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।
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शंकराचार्य का यह कथन केवल किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे महिला सम्मान, सत्ता की नैतिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि संत समाज का यह बयान सत्ता में बैठे लोगों को आत्ममंथन के लिए विवश करता है और समाज को नैतिक दिशा देने का कार्य करता है। वहीं आलोचकों का मत है कि इस प्रकार की टिप्पणी धार्मिक मंच से राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने का प्रयास है।
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के निजी जीवन को सार्वजनिक बहस का विषय बनाना अनुचित है और इससे लोकतांत्रिक गरिमा को ठेस पहुँचती है। मानवीय और सामाजिक दृष्टि से देखने वाले कुछ लोगों ने इस बयान को सत्य और साहसिक बताते हुए समर्थन भी किया है। उनका तर्क है कि भारत जैसी सांस्कृतिक परंपराओं वाली सभ्यता में महिला सम्मान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और यदि सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति से जुड़े ऐसे प्रश्न उठते हैं, तो उन पर चर्चा स्वाभाविक है।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सत्ता, नैतिकता और सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सोशल मीडिया पर यह बयान तेजी से वायरल हो रहा है, जहां लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे सही या गलत ठहराते हुए प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं। यह स्पष्ट है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द का यह वक्तव्य आने वाले समय में भी राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बना रहेगा।








