
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत बने जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता जांच में चयनात्मक रवैये के आरोप सामने आए हैं। RTI से मिले दस्तावेजों के अनुसार कृषि मंत्री कार्यालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद केवल एक फर्म की ही जांच कराई गई। इससे जांच की निष्पक्षता और प्रशासनिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
- PMKSY के तहत बने टैंकों की जांच प्रक्रिया पर संदेह
- दो फर्मों को बिना भौतिक परीक्षण मिली ‘क्लीन चिट’
- RTI दस्तावेजों से उजागर हुई कृषि निदेशालय की भूमिका
- किसानों से जुड़ी योजना में गुणवत्ता से समझौते का आरोप
देहरादून। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत प्रदेश में निर्मित जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। यह मामला कृषि मंत्री कार्यालय द्वारा जारी आदेश पत्रांक 3287, दिनांक 21 नवम्बर 2025 से जुड़ा है, जिसमें प्रदेश के समस्त जिलों में निर्मित सभी जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता जांच कर दोषी फर्मों पर तत्काल कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। यह आदेश उस समय जारी किया गया था, जब कृषि मंत्री के निरीक्षण के दौरान चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी जनपदों में निर्मित जियो लाइन टैंकों की गुणवत्ता पर गंभीर आपत्तियाँ सामने आई थीं।
मंत्री कार्यालय को अवगत कराया गया था कि कई फर्मों द्वारा बनाए गए टैंक निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं हैं और इससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके बावजूद कृषि निदेशालय द्वारा 24 नवम्बर 2025 को जारी पत्र में यह जानकारी दी गई कि उस समय प्रदेश में केवल तीन अधिकृत फर्में कार्यरत थीं— Saaransh Agro Solution (देहरादून), Shalimar Enviro Pvt. Ltd. (दिल्ली) और Varun Fertilizers Pvt. Ltd. (देहरादून)।
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चौंकाने वाली बात यह है कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है कि केवल Varun Fertilizers Pvt. Ltd. द्वारा निर्मित टैंकों की ही गुणवत्ता जांच कराई गई, जबकि शेष दो फर्मों को बिना किसी भौतिक या तकनीकी परीक्षण के ही संतोषजनक मान लिया गया। यह स्थिति कई गंभीर सवालों को जन्म देती है। जब मंत्री कार्यालय के निर्देश स्पष्ट रूप से “समस्त फर्मों एवं समस्त जिलों” में जांच के थे, तो फिर जांच को केवल एक फर्म तक सीमित क्यों किया गया? दो फर्मों को गुणवत्ता परीक्षण से बाहर रखने के पीछे क्या कारण रहे? और क्या पूरी जांच प्रक्रिया में चयनात्मकता या पक्षपात अपनाया गया?
यह पूरा मामला पूर्व कृषि अधिकारी, RTI एक्टिविस्ट एवं समाजसेवी श्री चन्द्र शेखर जोशी (भीमताल) द्वारा प्राप्त RTI दस्तावेजों के आधार पर सामने आया है। दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि यदि किसी फर्म की गुणवत्ता असंतोषजनक पाई जाती है तो उसे ब्लैकलिस्ट कर पंजीकरण निरस्त करने के निर्देश भी मंत्री कार्यालय ने दिए थे। हालांकि कृषि निदेशालय द्वारा की गई आंशिक और सीमित जांच से यह संदेह और गहराता जा रहा है कि कहीं कुछ फर्मों को बचाने का प्रयास तो नहीं किया गया।
अब यह प्रश्न सार्वजनिक हित से सीधे तौर पर जुड़ गया है कि क्या कृषि मंत्री कार्यालय को इस प्रकरण की पूरी और सही जानकारी दी गई, क्या जांच निष्पक्ष थी और क्या इस मामले में वित्तीय अनियमितताओं की भी आशंका है। किसानों से जुड़ी इस महत्वाकांक्षी योजना में यदि गुणवत्ता से किसी भी स्तर पर समझौता हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनहित के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा। ऐसे में इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।





