
साईं सृजन पटल के संस्थापक प्रो. (डॉ.) के. एल. तलवाड़ का मानना है कि रचनात्मक व्यक्ति विचारों से भयभीत नहीं होता, बल्कि उन्हें आमंत्रित करता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और विचार सृजन के माध्यम से समाज को प्रेरणा दे रहे हैं।
- साईं सृजन पटल के माध्यम से रचनात्मक अभिव्यक्ति को मिला मंच
- पुराने टेबल कैलेंडर से रचनात्मक पुनः उपयोग की मिसाल
- विचारों की निरंतरता से जन्म लेता है नवाचार
- सीमित संसाधनों में असीम सृजन की प्रेरणा
डोईवाला। बिना विचारों के न तो नवाचार संभव है और न ही प्रगति। जितने अधिक विचार जन्म लेते हैं, उतनी ही अधिक संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। यह विचार साईं सृजन पटल के संस्थापक प्रो. (डॉ.) के. एल. तलवाड़ के व्यक्तित्व और कृतित्व को पूरी तरह परिभाषित करता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी प्रो. तलवाड़ निरंतर सृजन और नवाचार की साधना में संलग्न हैं। उन्होंने साईं सृजन पटल की स्थापना कर रचनात्मक अभिव्यक्ति को एक सशक्त मंच प्रदान किया है, जहां नवोदित और अनुभवी रचनाकार अपने विचारों को निर्भीकता से प्रस्तुत कर रहे हैं।
विशेष बात यह है कि प्रो. तलवाड़ निरंतर नए-नए प्रयोगों के माध्यम से नवाचार को नया आयाम दे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने पुराने टेबल कैलेंडर का रचनात्मक पुनः उपयोग कर उसे एक नया स्वरूप प्रदान किया। साईं सृजन पटल की मासिक पत्रिका के विमोचन कार्यक्रम और पटल के प्रथम स्थापना दिवस की स्मृतियों को उन्होंने पुराने कैलेंडर के माध्यम से कलात्मक ढंग से संजोया। यह पहल न केवल उनकी रचनात्मक सोच को दर्शाती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और पुनः उपयोग (री-यूज) की भावना को भी मजबूती से सामने लाती है।
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प्रो. तलवाड़ का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में नई खोजें और नवाचार करने हैं, तो उसे केवल अच्छे विचारों की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अधिक से अधिक विचार उत्पन्न करने चाहिए। महान खोजें किसी एक चमकदार विचार से नहीं, बल्कि असंख्य छोटे-बड़े विचारों की श्रृंखला से जन्म लेती हैं। रचनात्मक व्यक्ति विचारों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें आमंत्रित करता है। वे कहते हैं कि केवल अच्छे विचारों की प्रतीक्षा करने से कुछ हासिल नहीं होता।
निरंतर विचार सृजन ही अच्छे और प्रभावशाली विचारों तक पहुँचने का सबसे सशक्त मार्ग है। प्रो. तलवाड़ के शिष्य और साईं सृजन पटल से जुड़े अंकित तिवारी बताते हैं कि उनके गुरु सदैव सार्थक और सकारात्मक विचारों पर ही अपनी ऊर्जा केंद्रित करते हैं। उनसे यह सीख मिली है कि नए-नए विचारों को आजमाने से कभी भयभीत नहीं होना चाहिए, क्योंकि हर विचार अगले बेहतर विचार की नींव बन सकता है। अंकित तिवारी के अनुसार, रचनात्मकता केवल कल्पना नहीं और सफलता केवल मेहनत नहीं है, बल्कि इन दोनों को जोड़ने वाला सेतु विवेक है।
विवेक के माध्यम से ही व्यक्ति सही और गलत के बीच संतुलन स्थापित कर पाता है। प्रो. के. एल. तलवाड़ की यह रचनात्मक पहल न केवल युवाओं को नवाचार के लिए प्रेरित करती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि सीमित संसाधनों में भी सृजन की असीम संभावनाएँ मौजूद हैं।





