
उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष एक बार फिर गंभीर होता जा रहा है। जनवरी के महज 19 दिनों में वन्यजीवों के हमलों से छह लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें चार की जान बाघ के हमले में गई है। वन विभाग ने इसे टाइगर ब्रीडिंग सीजन से जोड़ा है।
- चार मौतें बाघ, दो तेंदुए के हमले में
- कालागढ़, रामनगर और तराई क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित
- 2025 में बाघ और तेंदुओं ने ली थीं 31 जानें
- ब्रीडिंग सीजन में बढ़ा खतरा, जंगल जाने से बचने की सलाह
देहरादून। उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार भयावह रूप लेता जा रहा है। भालू के हाइबरनेशन में जाने के बावजूद हमलों में अपेक्षित कमी नहीं आई है, वहीं अब बाघ के हमलों में अचानक तेज़ी ने वनांचल से लेकर मैदानी इलाकों तक दहशत फैला दी है। जनवरी महीने के सिर्फ 19 दिनों में ही वन्यजीवों के हमलों से छह लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से चार लोगों की मौत बाघ के हमले में हुई है, जबकि दो लोगों की जान तेंदुए के हमले में गई।
बाघ के हमले कालागढ़ टाइगर रिजर्व, रामनगर और तराई पूर्वी वन प्रभाग क्षेत्र में सामने आए हैं। वहीं तेंदुए के हमलों में नैनीताल वन प्रभाग में एक महिला और पौड़ी जिले के बाड़ा गांव में एक व्यक्ति की मौत हुई है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 में बाघ के हमलों में 12 लोगों की मौत हुई थी और पांच लोग घायल हुए थे। वहीं तेंदुओं के हमलों में 19 लोगों की जान गई, जबकि 102 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा पशुधन, फसलों और संपत्ति को भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है।
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वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, यह समय बाघों के ब्रीडिंग (प्रजनन) का होता है, जिस कारण उनका व्यवहार अधिक आक्रामक हो जाता है। प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा ने बताया कि इस दौरान बाघ अपने क्षेत्र को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं और मानव गतिविधियों से टकराव की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे अनावश्यक रूप से जंगल में प्रवेश न करें। यदि आवश्यक कार्यवश जाना ही पड़े तो समूह में जाएं, आवाज करते रहें और सुरक्षा उपायों का पूरा पालन करें।
वन विभाग की ओर से प्रभावित इलाकों में गश्त बढ़ाई जा रही है और ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। लगातार बढ़ती घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मानव–वन्यजीव संघर्ष अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों और आबादी वाले इलाकों तक फैल चुका है। ऐसे में वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ मानव सुरक्षा को लेकर ठोस और दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।





