
यह आलेख जीवन के उतार-चढ़ाव, समय की भूमिका और कर्मों के महत्व को रेखांकित करता है। लेखक बताता है कि संबंधों में नजदीकियाँ या दूरियाँ व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार से तय करता है। सकारात्मक सोच, संवाद और ईश्वर पर विश्वास से जीवन को स्वस्थ, संतुलित और आनंदमय बनाया जा सकता है।
- जीवन, समय और सीख की प्रक्रिया
- कर्म, अहंकार और संबंधों की दिशा
- संवाद, सकारात्मकता और स्वस्थ जीवन
सुनील कुमार माथुर
हमारे महापुरुष कहते हैं कि जीवन से बड़ा कोई विद्यालय नहीं, कठिनाइयों से बढ़कर कोई परीक्षा नहीं और समय से बड़ा कोई शिक्षक नहीं। ईश्वर सिर्फ मिलाने का काम करता है। आज का इंसान तनिक-सी कठिनाई आ जाने पर घबरा जाता है। अतः घबराने की आवश्यकता नहीं है। जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। समय हमें समय-समय पर बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन हम उस ओर ध्यान नहीं देते हैं। सीखना और सिखाने की प्रक्रिया निरंतर जारी रहनी चाहिए। आप अपने से बड़े और बुज़ुर्गों के पास बैठिए। अनुभवी लोगों का साथ कीजिए। सकारात्मक सोच रखिए। फिर देखिए आपके जीवन में कितना बदलाव आता है और आप तनावमुक्त रहते हैं। आज ही अपने जीवन को सकारात्मक सोच की ओर ले जाइए और स्वस्थ एवं मस्त जीवन व्यतीत कीजिए।
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संबंधों में नजदीकियाँ या दूरियाँ बढ़ाने का काम व्यक्ति स्वयं करता है। वक्त अच्छा हो या बुरा, ऊपरवाला कभी हमारा साथ नहीं छोड़ता। हर क्षण अच्छा होता है, लेकिन हम उसे अपने अहंकार, लोभ, लालच व घमंड के कारण बुरा बना देते हैं और फिर भगवान को एवं अपनी किस्मत को दोष देते हैं। समय सभी के लिए एक-सा होता है। उसे हम अपने बुरे कर्मों के कारण बुरा बना देते हैं। इंसान इस नश्वर संसार में खाली हाथ ज़रूर आता है, लेकिन जाते समय अपने साथ अपने कर्मों की गठरी अवश्य ले जाता है। इसलिए जब भी कोई कर्म करे, तो श्रेष्ठ कर्म ही करे।
जब इंसान परेशानियों से घिरा हुआ हो या हताश व परेशान हो, तब यही कहता है कि यह भी कोई ज़िंदगी है। लेकिन वह यह भूल जाता है कि ज़िंदगी जीने के लिए ही है। इसे हम अपनी मनमर्जी से नहीं चला सकते। ज़िंदगी को जियो, उसे समझने की कोशिश न करो। चलते वक्त के साथ चलो, वक्त को बदलने की कोशिश न करो। लेकिन इंसान अपने आपको बड़ा ही चतुर और चालाक समझता है और वक्त को येन-केन प्रकारेण बदलने का प्रयास करता है, लेकिन वक्त बदलता नहीं है। वह तो अपनी ही गति व समय के अनुसार चलता है।
स्वस्थ और मस्त रहिए। दिल खोलकर हँसिए और दिल खोलकर ही साँस लो। अंदर ही अंदर घुटने की कोशिश न करो, क्योंकि घुट-घुट कर जीना हमारा लक्ष्य नहीं है। परमात्मा ने जब यह मानव जीवन दिया है, तो फिर आराम की ज़िंदगी जियो। हँसते-मुस्कुराते रहिए। सबके साथ संवाद कीजिए और मन की बात साझा कीजिए। हो सकता है कि यदि कोई आपकी समस्या हो, तो उसका समाधान भी निकल जाए। संवाद ही एकमात्र ऐसा ज़रिया है, जिसके जरिए हम स्वस्थ और मस्त रह सकते हैं और घुटन-भरी ज़िंदगी से बच सकते हैं। जीवन की हर समस्या को आसानी से नहीं सुलझा सकते, इसलिए कुछ बातें ईश्वर पर छोड़ दो। सब कुछ खुद सुलझाने की कोशिश न करो।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच एवं स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान








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