
आज के दौर में लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी रचनाओं का निष्पक्ष प्रकाशन और पाठकों तक पहुंच बन गई है। साहित्यकार सम्मेलन में वक्ताओं ने बदलते समय के अनुसार लेखन और माध्यम दोनों में परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।
- पत्र-पत्रिकाओं की मनमानी से जूझते लेखक
- अच्छे पाठकों की कमी पर साहित्यकार सम्मेलन में चिंता
- साहित्य को बचाने के लिए माध्यम बदलने का आह्वान
- प्रेम, मूल्य और बाल साहित्य की भूमिका पर मंथन
सुनील कुमार माथुर
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आज पत्र-पत्रिकाओं की मनमानी के चलते लेखकों के समक्ष बड़ी चुनौती है कि वह किसे अपनी रचनाएं भेजे और कौन उन्हें प्रकाशित करेगा। इसके लिए आज साहित्यकार तड़फ रहा हैं। केवल उन लोगों की ही रचनाएं प्रकाशित हो पा रही हैं, जिनकी सम्पादक मंडल से गहरी सांठगांठ है। यह बात चिंताजनक है। रचनाओं के प्रकाशन के लिए भी अब सम्पादक मंडल को याद दिलाना पड़ रहा है। यह कैसी विडम्बना है।
गत 5 से 7 अक्टूबर 2025 को प्रेक्षा विश्व भारती, कोबा, अहमदाबाद (गुजरात) में अणुव्रत लेखक मंच द्वारा आयोजित साहित्यकार सम्मेलन में मुनि कुमार श्रमणजी ने अपने उद्बोधन में कहा था कि आजकल अच्छे पाठक नहीं रहे। सम्पादकीय पढ़ने की उमंग नहीं रही। परिवार में पत्र-पत्रिकाएं आती भी नहीं हैं और जिस घर में कोरियर से पत्र-पत्रिकाएं आती हैं, वे बंद की बंद पड़ी रहती हैं। ऐसे हालात को देखते हुए लगता है कि अब पाठक मंच भी बनाना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि पुस्तकें युगों-युगों तक रहेंगी, लेकिन वेबसाइट नहीं रहेगी। उन्होंने साहित्यकारों को आह्वान किया कि वे पढ़ने लायक लिखें, चूंकि आज पढ़ने वाले बहुत कम हो गए हैं। अतः पाठकों को तैयार करने का दायित्व भी साहित्यकारों पर बढ़ गया है। साहित्यकार पढ़ने योग्य सामग्री लिखता है तो उसे प्रकाशित करने वाला कोई नहीं है। अगर कोई प्रकाशित करता है तो पढ़ने वाले नहीं हैं। अतः मजबूरन लेखक, पत्रकार व सम्पादक समझौता करते हैं, जो चिंता की बात है।
आज समाज और मूल्य बिखरते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार छोटे-छोटे परिवारों में बंट रहे हैं। जहां यह विकृति आती है, वहां साधु, संत, शिक्षक व लेखक इन विकृतियों को दूर करने का प्रयास करते हैं। इनमें से लेखक के लिखे की छाप लोगों पर पड़ती है। अतः साहित्यकारों को युग के अनुसार बदलना होगा। लेखकों के सामने अनेक चुनौतियां हैं और वे छोटे-छोटे लेख लिखें, लेकिन सार वाला लिखें। अगर लेखक हार मान गया तो सब गड़बड़ हो जाएगा। इसलिए साहित्यकारों को युग के अनुसार अपना माध्यम बदलना होगा, चूंकि हर विचार कहीं न कहीं लोगों को प्रभावित करता है।
डॉ. विमला भंडारी का कहना है कि बाल साहित्य बच्चों की पौधशाला है। अगर आप सभी से प्रेमपूर्वक बात करें तो हर कोई आपकी बात सुनेगा, चूंकि मानव जाति का कल्याण प्रेम और सौहार्द से ही संभव है। वहीं दूसरी ओर हम संयमित हो जाएं और अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर लें। आज प्रेम की कमी के कारण ही वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। व्यक्ति जब टूटता है तो समाज की एक-एक नस को तोड़ देता है। अतः प्रेमपूर्वक व्यवहार कीजिए, इसी में सबका भला है।
— सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान








Nice article
ए.आई. के इस युग में और ऑनलाइन माध्यम से , लोगों को किताबें पढ़ने की आदत नहीं रही । ऐसे में साहित्यकारों की चुनौतियाँ बहुत बढ़ गई हैं । अतः संक्षिप्त , स्पष्ट, सरल व रोचक लेखन शैली आवश्यक है ।
साहित्यकारों को समय की माँग को समझना होगा और पाठकों की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा ।
बहुत ही समय सामयिक आलेख है।
Nice