
BMC चुनाव से पहले राज ठाकरे के क्षेत्रीय और भाषाई नारों ने राजनीति गरमा दी है, जिस पर के. अन्नामलाई ने तीखा पलटवार किया। इस बयानबाजी से मुंबई की राजनीति में भाषा, पहचान और समावेशिता की बहस फिर केंद्र में आ गई है।
- ‘उठा लुंगी बजा पुंगी’ नारे से गरमाया मुंबई का सियासी माहौल
- मराठी अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता की बहस तेज
- अन्नामलाई बोले- भारत एक है, भाषा के नाम पर बांटना गलत
- BMC चुनाव में पहचान की राजनीति बन सकती है बड़ा मुद्दा
मुंबई/नई दिल्ली। मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनावों से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा और क्षेत्रीय पहचान को लेकर विवाद तेज हो गया है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे द्वारा दिए गए “उठा लुंगी बजा पुंगी” जैसे नारे और टिप्पणियों ने सियासी माहौल को गरमा दिया है। इस पर तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने कड़ा और बेबाक पलटवार किया है।
एक सार्वजनिक रैली में राज ठाकरे ने न केवल पुराने क्षेत्रीय नारों को दोहराया, बल्कि अन्नामलाई पर व्यंग्य करते हुए उन्हें “रस मलाई” कहकर संबोधित किया। उन्होंने सवाल उठाया कि तमिलनाडु से जुड़े नेता का महाराष्ट्र की राजनीति से क्या सरोकार है। ठाकरे ने यह भी कहा कि मुंबई और महाराष्ट्र मराठी लोगों की मेहनत से खड़े हुए हैं और यहां किसी भी तरह की भाषा या पहचान थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने इसे मराठी अस्मिता से जोड़ते हुए BMC चुनाव को निर्णायक बताया।
राज ठाकरे के इस बयान के जवाब में के. अन्नामलाई ने स्पष्ट और आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि यदि मुंबई आने पर उन्हें धमकाने या डराने की कोशिश की जाती है तो वह इससे डरने वाले नहीं हैं। अन्नामलाई ने सवाल किया कि जब भारत एक राष्ट्र है तो फिर लोगों को उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय या मराठी–गैर मराठी जैसे खांचों में बांटने का अधिकार किसी को किसने दिया। उन्होंने कहा कि मुंबई की प्रगति में देश के हर हिस्से से आए लोगों का योगदान है और इसे नकारा नहीं जा सकता।
राज ठाकरे की राजनीति लंबे समय से मराठी अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। शुरुआती दौर में इससे उन्हें राजनीतिक लाभ भी मिला, लेकिन समय के साथ मुंबई और महाराष्ट्र का सामाजिक ताना-बाना बदल चुका है। आज यह महानगर केवल मराठी बनाम गैर मराठी की राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक अवसरों, रोजगार और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बन चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की आक्रामक और विभाजनकारी भाषा अल्पकाल में सुर्खियां जरूर बटोरती है, लेकिन दीर्घकाल में इसके राजनीतिक नुकसान अधिक हो सकते हैं। विशेषकर तब, जब गैर मराठी समुदायों के साथ-साथ मराठी समाज का भी एक बड़ा वर्ग अब समावेशी और विकासोन्मुख राजनीति को प्राथमिकता देने लगा है।
दूसरी ओर, के. अन्नामलाई खुद को एक निर्भीक और राष्ट्रवादी सोच वाले नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उनकी राजनीति भाषा, जाति या क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता और आत्मसम्मान की बात करती है। यही कारण है कि युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।
कुल मिलाकर, BMC चुनाव से पहले राज ठाकरे और अन्नामलाई की यह बयानबाजी संकेत दे रही है कि आने वाले चुनावों में भाषा और पहचान एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। हालांकि, यह भी साफ है कि मुंबई और महाराष्ट्र का मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि समावेशी सोच, विकास और स्थिर राजनीति के आधार पर निर्णय लेने के मूड में है।








