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दिल्ली-एनसीआर में यूट्यूब से दवाइयां बनाना सीखकर नकली दवाओं का धंधा चलाने वाले दो आठवीं फेल आरोपियों का पर्दाफाश हुआ है, जो महज डेढ़ से दो रुपये की लागत में दवाइयां तैयार कर बाजार में 100 रुपये तक बेच रहे थे। पिछले छह वर्षों से चल रहे इस गोरखधंधे में पुलिस ने 358 किलोग्राम नकली दवाइयां बरामद की हैं और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी है।
- डेढ़ रुपये की लागत, सौ रुपये की बिक्री, नकली दवाओं का चौंकाने वाला खेल
- यूट्यूब बना अपराध की पाठशाला, नकली दवाओं से लोगों की सेहत से खिलवाड़
- छह साल से चल रहा था गोरखधंधा, 358 किलो नकली दवाएं बरामद
- सस्ती लागत और मोटा मुनाफा, नकली दवाओं के कारोबार का खुलासा
दिल्ली-एनसीआर। देशभर में नकली दवाइयों की सप्लाई कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले एक बड़े नेटवर्क का पुलिस ने खुलासा किया है। इस चौंकाने वाले मामले में पकड़े गए दोनों आरोपी महज आठवीं कक्षा फेल हैं, जिन्होंने किसी मेडिकल डिग्री या औपचारिक प्रशिक्षण के बिना यूट्यूब के सहारे नकली दवाइयां बनाना सीख लिया। पुलिस की जांच में सामने आया है कि आरोपी बीते करीब छह वर्षों से यह अवैध कारोबार चला रहे थे और करोड़ों का मुनाफा कमा चुके थे। पुलिस पूछताछ में आरोपी गौरव भगत ने बताया कि उसने यूट्यूब पर वीडियो देखकर बेटनोवेट-सी और क्लोप-जी जैसी लोकप्रिय क्रीम बनाना सीखा।
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इसके बाद उसने दिल्ली के आनंद पर्वत इलाके से दवाइयां बनाने वाली मशीनें खरीदीं। बाद में उसने अपने साथी विशाल गुप्ता के साथ मिलकर गांव में ही एक छोटी फैक्टरी स्थापित कर ली, जहां बड़े पैमाने पर नकली दवाइयों का उत्पादन शुरू कर दिया गया। जांच में सामने आया है कि इन नकली दवाइयों को बनाने में महज डेढ़ से दो रुपये की लागत आती थी। तैयार माल को आरोपी 15 रुपये प्रति ट्यूब की दर से होलसेलरों को बेच देते थे। इसके बाद यह दवाइयां होलसेल और रिटेल नेटवर्क के जरिए बाजार में पहुंचती थीं, जहां इन्हीं क्रीमों की कीमत 70 से 100 रुपये तक वसूली जाती थी। इस पूरे चक्र में सबसे बड़ा नुकसान आम मरीजों को हो रहा था, जो महंगी दवाइयों के नाम पर नकली और संभावित रूप से खतरनाक उत्पाद इस्तेमाल कर रहे थे।
पुलिस के अनुसार, आरोपियों को अलग-अलग राज्यों के सप्लायर कच्चा माल उपलब्ध करा रहे थे। इसी कच्चे माल से ट्यूबों में क्रीम भरकर पैकिंग की जाती थी और उन्हें असली ब्रांड की तरह बाजार में उतार दिया जाता था। छापेमारी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के ठिकानों से 358 किलोग्राम तैयार नकली दवाइयां बरामद की हैं, जो इस गोरखधंधे के बड़े पैमाने को दर्शाता है। पूछताछ में यह भी सामने आया कि शुरुआत में गौरव और विशाल किसी डिस्ट्रीब्यूटर के लिए दवाइयों की सप्लाई का काम करते थे। इसी दौरान उनके एक परिचित ने नकली दवाइयां बनाने का आइडिया दिया। इसके बाद गौरव ने यूट्यूब पर दवा निर्माण से जुड़े वीडियो खोजे और वहीं से पूरी प्रक्रिया सीखकर दोनों इस अवैध धंधे में उतर गए।
पुलिस की छानबीन में यह भी पता चला है कि नकली दवाइयों के कारोबार से आरोपियों ने काफी संपत्ति अर्जित कर ली है। जांच एजेंसियां अब उनकी संपत्तियों को अटैच करने की तैयारी कर रही हैं। मामले की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि दोनों आरोपियों से लगातार पूछताछ जारी है और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान कर जल्द ही और गिरफ्तारियां की जाएंगी। यह मामला न केवल नकली दवाइयों के बढ़ते खतरे को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल किस तरह लोगों की जान के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। पुलिस और ड्रग कंट्रोल विभाग के लिए यह चुनौती है कि ऐसे नेटवर्क को जड़ से खत्म किया जाए, ताकि आम लोगों की सेहत सुरक्षित रह सके।








