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पहाड़ों को प्रदूषण से सुरक्षित मानकर लोग यहां बस तो रहे हैं, लेकिन अल्मोड़ा में नवजात शिशुओं में हृदय रोग के मामले चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले एक वर्ष में 10 से अधिक बच्चों में जन्मजात हृदय रोग की पुष्टि हुई है, जिससे स्वास्थ्य विभाग सतर्क हो गया है।
- अल्मोड़ा में एक साल में 10 से अधिक शिशुओं में जन्मजात हृदय रोग की पुष्टि, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट
- बेस अस्पताल में हर महीने सामने आ रहे औसतन तीन नवजात हार्ट पेशेंट
- पल्स ऑक्सीमीटर और इको जांच से हो रही समय पर पहचान
- गर्भावस्था में संक्रमण और मधुमेह बन रहे बड़े कारण
- विशेषज्ञों ने जागरूकता और त्वरित इलाज पर दिया जोर
अल्मोड़ा। महानगरों के बढ़ते प्रदूषण से राहत पाने की उम्मीद में लोग पहाड़ी क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से सामने आ रही एक रिपोर्ट ने नई चिंता खड़ी कर दी है। यहां नवजात शिशुओं में जन्मजात हृदय रोग यानी कंजेनिटल हार्ट डिजीज (सीएचडी) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की रिपोर्ट के अनुसार, बीते एक वर्ष में जिले में 10 से अधिक शिशुओं में जन्मजात हृदय में छेद की पुष्टि हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जन्मजात हृदय रोग कई प्रकार के होते हैं। कुछ मामलों में हृदय में हल्के छेद होते हैं, जो समय के साथ निगरानी में ठीक भी हो सकते हैं, लेकिन कई मामलों में यह समस्या गंभीर रूप ले लेती है।
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ऐसे शिशुओं को तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप और कई बार सर्जरी की जरूरत पड़ती है। समय पर इलाज न मिलने की स्थिति में शिशु के जीवन पर भी खतरा मंडरा सकता है। अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज और बेस अस्पताल से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले में हर महीने औसतन तीन ऐसे नवजात सामने आ रहे हैं, जिनके हृदय में जन्मजात दोष पाया जा रहा है। अस्पताल में जन्म लेने वाले सभी नवजातों की पल्स ऑक्सीमीटर के माध्यम से स्क्रीनिंग की जा रही है। यदि ऑक्सीजन स्तर या अन्य संकेतों में कोई असामान्यता पाई जाती है, तो तुरंत इको जांच कर बीमारी की पुष्टि की जाती है, ताकि समय रहते उपचार शुरू किया जा सके।
बेस अस्पताल के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अमित कुमार सिंह के अनुसार, हृदय में छेद एक जन्मजात दोष है, जिसमें शिशु का हृदय गर्भ में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। इसके प्रमुख लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, अत्यधिक नींद आना, दूध पीने में परेशानी, त्वचा, होंठ और नाखूनों का नीला पड़ना शामिल है। ऐसे लक्षण दिखने पर माता-पिता को तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जन्मजात हृदय रोग के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान वायरल संक्रमण, आनुवंशिक कारण, गर्भवती महिला में मधुमेह की समस्या, समय से पहले प्रसव और कुपोषण जैसी स्थितियां शिशु के हृदय विकास को प्रभावित कर सकती हैं। यही कारण है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच और सावधानियां बेहद आवश्यक मानी जा रही हैं।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी अल्मोड़ा, नवीन चंद्र तिवारी का कहना है कि जन्मजात हृदय में छेद के मामलों में जागरूकता सबसे अहम है। ऐसे शिशुओं को विशेष देखरेख और समय पर उपचार की जरूरत होती है। यदि बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो शिशु को बेहतर जीवन देने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं। स्वास्थ्य विभाग अब इस बात पर भी मंथन कर रहा है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते ऐसे मामलों के पीछे पर्यावरणीय बदलाव, जीवनशैली और अन्य छिपे कारणों की भी गहराई से जांच की जाए, ताकि भविष्य में इस समस्या को नियंत्रित किया जा सके।








