
🌟🌟🌟
जोधपुर में साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने कहा कि साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी होता है और अपनी लेखनी से समाज को दिशा देता है। उन्होंने डॉ. कृष्णा कुमारी की पुस्तक ‘बात-बात खुश्बूदार’ को युवाओं के लिए प्रेरणादायक और समाजोपयोगी कृति बताया।
- ‘बात-बात खुश्बूदार’ पुस्तक समीक्षा में बोले माथुर, युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है यह कृति
- डॉ. कृष्णा कुमारी की पुस्तक में समाज मार्गदर्शन की स्पष्ट झलक
- नारी विमर्श से बाल मनोविज्ञान तक, 51 आलेखों का समृद्ध संकलन
- सरल और बोधगम्य लेखन शैली पाठकों को जोड़ती है
- हिंदी-राजस्थानी साहित्य में डॉ. कृष्णा कुमारी का सशक्त योगदान
जोधपुर। साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी होता है और यही उसकी सबसे बड़ी भूमिका है कि वह अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को नई दशा और दिशा प्रदान करे। यह विचार साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने डॉ. कृष्णा कुमारी द्वारा लिखित निबंध संग्रह ‘बात-बात खुश्बूदार’ की समीक्षा के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक सजग साहित्यकार दिन-रात समाज के प्रति जागरूक रहकर अपने लेखन से सामाजिक चेतना को मजबूत करता है।
Government Advertisement...
सुनील कुमार माथुर ने कहा कि डॉ. कृष्णा कुमारी की पुस्तक ‘बात-बात खुश्बूदार’ वर्तमान समय में विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। इस पुस्तक में संकलित निबंध न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध हैं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों को भी मजबूती प्रदान करते हैं। लेखिका ने अपने निबंधों को साहित्यिक, सांस्कृतिक, व्यक्तिपरक, नारी विमर्श, आलोचनात्मक और बाल मनोवैज्ञानिक वर्गों में विभाजित किया है, जिससे पाठकों को विषयों की व्यापक समझ मिलती है।
उन्होंने बताया कि इस निबंध संग्रह में समाज के विविध पक्षों को छूते हुए कुल 51 आलेख शामिल किए गए हैं। सभी निबंध सरल, प्रेरक और सहज भाषा में लिखे गए हैं, जिससे वे हर वर्ग के पाठकों के लिए बोधगम्य बनते हैं। लेखन में प्रवाह और विचारों की स्पष्टता पुस्तक को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। नारी विमर्श के अनेक पहलुओं को लेखिका ने संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, जो वर्तमान सामाजिक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।
पुस्तक में ‘छोटी-छोटी सावधानियां, बड़ी उपलब्धियां’, ‘क्षमावीर’, ‘घर हो खुश्बूदार’, ‘बालक को बालक ही रहने दो’, ‘निराला का वात्सल्य’, ‘नारी संदेह के घेरे में’, ‘स्वच्छता’, ‘वाचनालय और पाठक’, ‘घर नगर में खो गए’ और ‘डाकिया बाबू’ जैसे विषयों पर लिखे गए निबंध शामिल हैं। माथुर ने यह भी कहा कि लेखिका पर कविवर निराला का गहरा प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो उनके विचारों और भावों में झलकता है।
डॉ. कृष्णा कुमारी के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें कविता संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, कहानी, बाल गीत, निबंध, आलेख संग्रह, यात्रा वृत्तांत और साक्षात्कार शामिल हैं। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में भी सशक्त लेखन किया है।
इसके अलावा डॉ. कृष्णा कुमारी की रुचि संगीत, वाद्ययंत्र, चित्रकारी और स्केच जैसी कलाओं में भी रही है, लेकिन इसके बावजूद वह निरंतर साहित्य सृजन के प्रति समर्पित बनी हुई हैं। समीक्षा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि ऐसी रचनाएं समाज को सोचने, समझने और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं, और ‘बात-बात खुश्बूदार’ इसी कड़ी की एक महत्वपूर्ण कृति है।








