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देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने देह व्यापार मामले में साक्ष्यों के अभाव के कारण तीन आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया, क्योंकि पीड़ित महिलाओं को अदालत में पेश ही नहीं किया जा सका। अदालत ने जांच में लापरवाही मानते हुए जिलाधिकारी और एसएसपी को कार्रवाई के निर्देश दिए।
- देहरादून में देह व्यापार मामले की सुनवाई में बड़ा मोड़
- साक्ष्य न मिलने से होटल मैनेजर और दो ग्राहक दोषमुक्त
- पीड़ितों के लापता होने पर अदालत ने उठाए गंभीर सवाल
- जिलाधिकारी और एसएसपी को दिए गए त्वरित कार्रवाई के निर्देश
देहरादून। देहरादून में देह व्यापार से जुड़े एक पुराने और संवेदनशील मामले में अदालत ने ऐसा निर्णय दिया जिसने स्थानीय प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट (पोक्सो) रजनी शुक्ला की अदालत ने होटल मैनेजर और दो ग्राहकों को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया। अदालत का यह आदेश केवल बरी करने तक सीमित नहीं रहा—इसने पुलिस विवेचना की कमियों और पीड़ितों की “गायब” स्थिति पर भी कड़ा संज्ञान लिया।
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फैसले में अदालत ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष देह व्यापार के लिए होटल से बरामद दो महिलाओं को पेश करने में असफल रहा, जिसके कारण साक्ष्य अधूरे रह गए। साथ ही यह भी पाया गया कि होटल का मालिक इस मामले में आरोपित तक नहीं बनाया गया, जो विवेचना में गंभीर त्रुटि है। अदालत ने इस आधार पर जिलाधिकारी और एसएसपी को निर्देश दिए कि होटल मैनेजर के विरुद्ध आवश्यक विभागीय कार्रवाई की जाए और भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही न होने पाए।
घटना का मूल प्रकरण (27 जनवरी 2018)
एसआई प्रदीप रावत, ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट विकासनगर के साथ छापेमारी के दौरान सम्राट होटल पहुंचे, जहाँ देह व्यापार संचालित होने की जानकारी मिली थी। पुलिस कमरे में दाखिल हुई तो एक व्यक्ति को आपत्तिजनक स्थिति में पाया गया, जो पुलिस को देखकर दरवाजे के पीछे छिप गया। बिस्तर पर मौजूद महिला ने बताया कि वह पश्चिम बंगाल से लाई गई है। आरोपित हरि किशोर, छपरा (बिहार) का निवासी, मौके से पकड़ा गया। उसकी जेब से आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद हुई।
दूसरे कमरे में एक और युवती मिली, जिसने खुद को गौतमबुद्ध नगर की बताया। दोनों महिलाओं ने बताया कि नावेद अली नाम का व्यक्ति उन्हें सिलाई-कढ़ाई का काम दिलाने के बहाने लाया था, मगर बाद में जबरन गलत काम कराया जाने लगा। छापेमारी के दौरान पुलिस ने नावेद अली को भी गिरफ्तार किया, जिसने खुद को होटल कर्मचारी बताया और यह स्वीकार किया कि वह बिना पहचान पत्र के सस्ते कमरों की व्यवस्था करवाता है। जब पुलिस ने होटल मैनेजर सूरत सिंह से आगंतुक रजिस्टर की मांग की, तो उसमें किसी प्रकार की एंट्री ही नहीं मिली—जो होटल के संचालन में अनियमितताओं का बड़ा प्रमाण था।
विवेचना में त्रुटियाँ और पीड़ितों का ‘लापता’ होना
इस मामले की विवेचना डीएसपी शिशुपाल सिंह नेगी, एसआई स्मृति रावत और निरीक्षक महेश जोशी द्वारा की गई। मार्च 2019 में आरोपपत्र दाखिल किया गया, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि होटल से बरामद दोनों महिलाएँ बाद में विकासनगर छोड़कर कहीं चली गईं, और पुलिस उन्हें ढूंढने में पूरी तरह विफल रही। टीमों को बाहर भी भेजा गया, परंतु दोनों का कोई पता नहीं लगा। अदालत ने इसे विवेचना की गंभीर चूक माना। चूँकि पीड़ित महिलाओं के बयान ही मामले का केंद्रीय साक्ष्य थे, उनकी अनुपस्थिति में अभियोजन पक्ष अपनी दलील साबित नहीं कर पाया।
अदालत का हस्तक्षेप और प्रशासन को स्पष्ट निर्देश
अदालत ने आदेश देते हुए कहा कि होटल मैनेजर के विरुद्ध कार्रवाई की जाए और विवेचना में लापरवाही दिखाने वाले अधिकारियों पर भी संज्ञान लिया जाए। यह आदेश पुलिस के उस ढांचे पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जहाँ मानव तस्करी और देह व्यापार जैसे मामलों में पीड़ितों की सुरक्षा और उनकी उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण होती है। यह मामला केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और प्रशासन के समन्वय की परीक्षा भी बनकर सामने आया है।





