
🌟🌟🌟
अरावली की ऊँचाई-आधारित परिभाषा ने उसके 80–90% क्षेत्र को संरक्षण से बाहर कर एक गहरे पर्यावरणीय संकट को जन्म दे दिया है। यह बदलाव दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी, तापमान और जलवायु सुरक्षा दीवार को अभूतपूर्व खतरे में डालता है।
- अरावली की सिकुड़ती ढाल और दिल्ली का डूबता पर्यावरण
- अरावली की चोट, दिल्ली की सांसें—एक पर्यावरणीय संकट
- 100 मीटर की परिभाषा और दिल्ली का खतरे में भविष्य
- टूटी अरावली, जहरीली दिल्ली—पर्वतमाला के विघटन की त्रासदी
- अरावली बचेगी तो दिल्ली बचेगी—वरना पर्यावरण का पतन निश्चित
डॉ. सत्यवान सौरभ
Government Advertisement...
भारत के उत्तरी भूगोल में अरावली महज एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि एक जीवंत पर्यावरणीय संरचना है—धूल को रोकने वाली दीवार, भूजल पुनर्भरण क्षेत्र, प्राकृतिक शीतलन प्रणाली और एक विशाल हरा कवच। किंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल में पर्यावरण मंत्रालय की उस अनुशंसा को मान्यता देना, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भू-भाग को ही अरावली की “पहाड़ी” माना जाएगा, दिल्ली-एनसीआर की पर्यावरणीय सुरक्षा पर एक गहरी चोट के समान है। इस परिभाषा से 80–90 प्रतिशत तक का वह क्षेत्र, जो जंगल, झाड़ियाँ, पथरीली सतहें, कटक, नालियाँ और निम्न-ढालों के रूप में अरावली के असली पारिस्थितिक तंत्र को बनाता है, संरक्षण से बाहर हो जाता है।
अरावली का संरक्षण अब “ऊँचाई” पर आधारित हो गया है, न कि उसके पर्यावरणीय कार्यों पर। यह बदलाव उस पारिस्थितिक सच्चाई को नजरअंदाज करता है कि किसी भी पर्वतमाला की वास्तविक भूमिका उसकी जल-नालियों, दरारों, रंध्रता, मिट्टी, जैव विविधता, छाया, तापमान नियंत्रण क्षमता और हवा-रोधक संरचना में निहित होती है—न कि उसकी भौतिक ऊँचाई में। इसी कारण अरावली की छोटी श्रृंखलाएँ, जो दूर से साधारण टीले भर दिखती हैं, वास्तव में दिल्ली के पर्यावरण की रीढ़ हैं। जब ये ढालें टूटती हैं, काटी जाती हैं, समतल की जाती हैं या इनके बीच सड़कें, फार्महाउस, रिसॉर्ट और औद्योगिक निर्माण घुसपैठ करते हैं, तब यह न केवल दिल्ली के हवा-पानी-तापमान संतुलन को बिगाड़ते हैं, बल्कि एक स्थायी पर्यावरणीय पतन की ओर ले जाते हैं।
अरावली के कटाव का सबसे गहरा प्रभाव दिल्ली की हवा पर पड़ता है। इन पहाड़ियों की मिट्टी और पथरीले अवशेष, जैसे ही सतह पर खुलते हैं, हवा के हल्के झोंके से उड़कर महीन धूल में बदल जाते हैं। यह धूल दिल्ली की पहले से ही प्रदूषण-फँसी संरचना को और भी दमघोंटू बना देती है। दिल्ली की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि शीतकाल में हवा की प्रवाह गति बहुत धीमी पड़ती है। ऐसी स्थिति में अरावली की टूटी ढालें प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देती हैं। राजस्थान से आने वाली पश्चिमी हवाएँ, जो पहले अरावली की दीवार पर अटक जाती थीं, अब बिना रोके दिल्ली में धूल और गरमी का भार लेकर प्रवेश करती हैं। परिणाम यह कि दिल्ली की हवा में PM-10 और PM-2.5 का स्तर लगातार बढ़ता जाता है और स्मॉग परतों के रूप में शहर पर छा जाता है।
दूसरा बड़ा असर दिल्ली-एनसीआर के जलसंकट पर पड़ता है। अरावली एक विशाल प्राकृतिक “वॉटर-रिचार्ज इंजन” है। इसकी संरचना में मौजूद पथरीली दरारें, नालियाँ, खनिजयुक्त पत्थर और छिद्रता बारिश के पानी को सैकड़ों फीट अंदर तक खींचकर ले जाती हैं। लेकिन जब पहाड़ियों को काटकर समतल कर दिया जाता है और उनकी जगह कंक्रीट, सड़कें या बस्तियाँ उग आती हैं, तब पानी धरती में रिसता नहीं बल्कि सतह पर बह जाता है। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है, छोटे प्राकृतिक जलस्रोत नष्ट हो जाते हैं और भूजल recharge लगभग समाप्त हो जाता है। आज दिल्ली, गुड़गाँव, फरीदाबाद और सोहना के कई इलाकों में भूजल 800–1000 फीट तक जा चुका है। अरावली का और क्षरण इस स्तर को और नीचे धकेल देगा, जिससे पानी का संकट भयावह रूप ले लेगा।
अरावली के क्षरण का तीसरा और अत्यंत गंभीर प्रभाव है दिल्ली की गर्मी पर। अरावली का वन-तंत्र, झाड़ियाँ, मध्यम ऊँचाई वाली ढालें और पथरीली सतहें एक प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम के रूप में काम करती हैं। यह प्रणाली छाया, वाष्पोत्सर्जन और हवा की गति नियंत्रित करके तापमान को कम करती है। जब इन जगहों पर कंक्रीट फैला दिया जाता है, तब ये क्षेत्र “हीट आइलैंड” में बदल जाते हैं—जहाँ तापमान आसपास की तुलना में कई डिग्री अधिक रहता है। वैज्ञानिक अध्ययन दिखाते हैं कि अरावली की प्रत्येक टूटी ढाल दिल्ली की गर्मी में 0.2–0.4°C तक की वृद्धि जोड़ देती है। यह प्रभाव जब बड़े भू-भाग पर फैलता है, तब दिल्ली का तापमान 50–52 डिग्री तक स्थायी रूप से पहुँचने लगता है। गर्मी बढ़ने का असर केवल discomfort तक सीमित नहीं होता; इससे बिजली की खपत, पानी की माँग, शहरी दुर्घटनाएँ, स्वास्थ्य संकट और ताप-दबाव संबंधी समस्याएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
अरावली का एक और महत्वपूर्ण पहलू, जिसे देश अक्सर अनदेखा करता है, यह है कि यह थार मरुस्थल को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। यदि अरावली कमजोर होती है या उसके बीच कृत्रिम दरारें बनाई जाती हैं, तो राजस्थान की ओर से चलने वाली शुष्क, रेतीली हवाएँ और भारी मात्रा में धूल दिल्ली तथा हरियाणा में दाखिल हो सकती है। इसे वैज्ञानिक भाषा में “डेजर्टिफिकेशन की प्रवृत्ति” कहा जाता है—एक ऐसा परिवर्तन जो मिट्टी, उपजाऊ क्षमता, नमी, वनस्पति और संपूर्ण जलवायु को स्थायी रूप से बदल देता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि 100 मीटर की परिभाषा अरावली को एक सतत श्रृंखला से काटकर टुकड़ों में विभाजित कर देगी। कोई भी पर्वतमाला तभी पर्यावरणीय कार्य कर पाती है, जब वह भौगोलिक रूप से निरंतर हो। परिभाषा का यह विभाजन अवैध निर्माण, खनन और कंक्रीट के विस्तार को निमंत्रण देगा। इससे अरावली के हवा-रोधक, जलसंचयन, तापमान संतुलन और धूल-नियंत्रण संबंधी कार्य लगभग समाप्त हो जाएँगे। इसका अर्थ है—दिल्ली का प्रदूषण बढ़कर स्थायी और खतरनाक हो जाना।
इस पूरे संकट से निकलने के लिए एकमात्र समाधान यही है कि अरावली की परिभाषा “ऊँचाई आधारित” नहीं बल्कि “पर्यावरणीय कार्य आधारित” हो। जंगल, झाड़ियाँ, पथरीले परिदृश्य, नालियाँ, चरागाह, और निम्न-ढालें—सबको कानूनी रूप से अरावली का हिस्सा माना जाए। अवैध खनन और निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। टूटे पहाड़ों का पुनरुत्थान, देशज वृक्षारोपण और जलसंग्रह संरचनाओं का निर्माण व्यापक स्तर पर किया जाए। सबसे आवश्यक यह है कि अरावली की भौगोलिक निरंतरता को पुनः स्थापित किया जाए, ताकि NCR-Delhi को एक मजबूत, अविच्छिन्न पर्यावरणीय कवच वापस मिल सके। अरावली केवल हरियाणा, राजस्थान या दिल्ली का प्रशासनिक विषय नहीं। यह पूरे उत्तरी भारत की जलवायु सुरक्षा दीवार है। इसका टूटना दिल्ली की हवा, पानी और तापमान तीनों को स्थायी संकट में धकेल देगा। अरावली का बचना ही दिल्ली का बचना है; यदि अरावली जिंदा रहेगी, तभी दिल्ली साँस ले पाएगी।








