
राज शेखर भट्ट
उत्तराखण्ड की राजनीति हमेशा से पहाड़ी जीवन, क्षेत्रीय असंतुलन, पलायन, बेरोज़गारी, सांस्कृतिक अस्मिता और पहाड़ी स्वाभिमान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2000 में राज्य निर्माण के साथ जो आशाएँ जागीं थीं, आज भी वे अनेक रूपों में राजनीति को प्रभावित करती हैं। बीते 25 वर्षों में उत्तराखण्ड ने कई मुख्यमंत्री देखे—कुछ का कार्यकाल लंबा रहा, कुछ का अचानक बदल दिया गया, और यह अस्थिरता राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा चरित्र बन गई। लेकिन जैसे-जैसे युवा मतदाता, नई नेतृत्व शैली और डिजिटल राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है, राज्य एक नए राजनीतिक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई देता है। इसी बदलते परिदृश्य में “भविष्य के मुख्यमंत्री” का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
उत्तराखण्ड में राजनीति हमेशा दो ध्रुवों—भाजपा और कांग्रेस—के आसपास ही केंद्रित रही है। दोनों दलों ने वर्षों तक सत्ता का मौका पाया, लेकिन जनता की सबसे बड़ी शिकायत रही कि पहाड़ और मैदान के विकास का संतुलन कभी नहीं बन पाया। गढ़वाल बनाम कुमाऊँ, शहर बनाम गाँव, और दिल्ली-केंद्रित राजनीति बनाम स्थानीय नेतृत्व की खींचतान ने राज्य को स्थिर नेतृत्व से दूर रखा। यही कारण है कि उत्तराखण्ड के लोग आज ऐसे मुख्यमंत्री की तलाश में हैं जो दीर्घकालिक विज़न, स्थिरता, ईमानदारी, और स्थानीय जरूरतों की समझ दोनों रखता हो।
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राज्य की वर्तमान राजनीति में नेतृत्व की नई पीढ़ी धीरे-धीारे उभर रही है। युवा जनप्रतिनिधि, सोशल मीडिया पर सक्रिय नेता, जमीनी स्तर पर काम करने वाले गैर-दलित संगठन, महिला नेतृत्व और शिक्षित पेशेवरों की राजनीति में बढ़ती भागीदारी एक नए राजनीतिक परिवर्तन का संकेत देती है। 2025 के बाद की राजनीति में उत्तराखण्ड के मतदाता अब केवल पार्टी नहीं, बल्कि चेहरे, नीति, और काम को प्राथमिकता देने लगे हैं। इस बदलाव के बीच एक नए मुख्यमंत्री की अपेक्षाएँ भी बिल्कुल स्पष्ट हैं। जनता के मन में एक सवाल है—भविष्य का मुख्यमंत्री कैसा हो? उत्तर है: वह नेता जो ‘पहाड़’ को समझता हो, लेकिन ‘मैदान’ की जरूरतों से भी जुड़ा हो; विकास के वादे न करे बल्कि कठिन भूगोल के भीतर काम करने की क्षमता रखता हो; पलायन रोकने के लिए पहाड़ में आर्थिक अवसर पैदा कर सके; पर्यटन, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और सैन्य-बहुल संस्कृति को आगे बढ़ाए।
उत्तराखण्ड को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो ‘जनता के बीच का’, ‘जनता के साथ का’, और ‘जनता की भाषा में बात करने वाला’ हो। पिछले वर्षों में राज्य में ऐसे कई चेहरे उभरे हैं जिन्होंने अपने कार्य, छवि और व्यवहार से भविष्य के नेतृत्व की झलक दिखाई है। नए दौर के मतदाता उन नेताओं को पसंद करते हैं जो नीतियों में पारदर्शिता रखें, भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर रूख अपनाएं और सरकारी तंत्र में जवाबदेही बढ़ाएं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भविष्य का मुख्यमंत्री वह होगा जो राज्य की तीन बड़ी चुनौतियों—पलायन, दुर्गम क्षेत्रों में विकास, और संसाधनों के उचित उपयोग—पर निर्णायक और साहसिक निर्णय ले सके। राज्य की राजनीति में महिला नेतृत्व की भूमिका भी बढ़ रही है। पर्वतीय समाजों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, इसलिए आने वाले वर्षों में उत्तराखण्ड राजनीति महिला-प्रधान निर्णयों और नेतृत्व की तरफ भी मुड़ सकती है।
स्थानीय महिलाएँ, शिक्षिकाएँ, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा प्रतिनिधि राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। उत्तराखण्ड के जनमानस में यह भावना भी स्पष्ट है कि भविष्य का मुख्यमंत्री ऐसा होना चाहिए जो दिल्ली या देहरादून की राजनीति नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की आवाज उठाए। ऐसे नेता की जरूरत है जो गांवों को खाली होने से बचाए, पहाड़ी कृषि को बाजार से जोड़े, स्थानीय उद्योग—हस्तशिल्प, पर्यटन, योग-वेलनेस, जैविक खेती—को नई ऊर्जा दे सके। साथ ही, पर्यावरण-संवेदनशील विकास मॉडल को अपनाए, क्योंकि उत्तराखण्ड की असली पूंजी उसका प्राकृतिक वातावरण है। आने वाला समय बताता है कि राज्य में बार-बार नेतृत्व बदलने की राजनीति अब लोगों को स्वीकार्य नहीं। युवा मतदाता आज ऐसी सरकार चाहता है जो पाँच वर्ष न केवल सत्ता में रहे, बल्कि पाँच वर्ष ईमानदार और ठोस काम भी करे। यही कारण है कि 2027 और उसके बाद की राजनीति में उत्तराखण्ड में क्षेत्रीय नेतृत्व, गैर-दलीय चेहरे और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े नेताओं की भूमिका और प्रभाव बढ़ सकता है।
यदि भविष्य के मुख्यमंत्री की अवधारणा को व्यापक रूप से समझें, तो वह एक ऊर्जावान, ईमानदार, संवेदनशील और आधुनिक सोच वाला नेता होगा। ऐसा नेता जो परंपरा और आधुनिकता दोनों को संतुलित कर सके; वेदना और विकास को एक साथ महसूस कर सके; और जो पहाड़ की रग-रग से वाक़िफ हो। अंततः, उत्तराखण्ड की राजनीति परिवर्तन के दौर में है और यह परिवर्तन स्थायी भी हो सकता है—यदि जनता ऐसे नेतृत्व को चुनने का साहस करे जो केवल चेहरों के आधार पर नहीं, बल्कि कार्यक्षमता, अनुभव, ईमानदारी और विज़न के आधार पर खड़ा हो। भविष्य का मुख्यमंत्री वही होगा जो उत्तराखण्ड को केवल ‘पर्यटन राज्य’ की पहचान से आगे ले जाकर एक ‘सशक्त, आत्मनिर्भर और संवेदनशील हिमालयी राज्य’ के रूप में स्थापित कर सके।







