
इमरान
बेगूसराय, बिहार
कलम से लिखे थे सपनों के काग़ज़,
जनता ने डाले थे ईमान के फ़र्ज़।
उम्मीदों की कतार में खड़े थे लोग,
सोचा था—आज जीतेंगे सच के जोग।
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पर अंधेरों ने चुपके से पन्ना पलट दिया,
वोट का रंग बदलकर इतिहास बदल दिया।
गिनती से पहले ही नतीजे लिख दिए गए,
जनता के सपने तिजोरियों में रख दिए गए।
चुनाव का मंदिर अब सौदे की दुकान सा है,
जहाँ सच्चाई हारती और झूठा भगवान सा है।
कानून के रखवाले भी चुप हैं, बेहिसाब,
किससे कहें—हमारे वोट का हुआ हिसाब?
ओ लोकतंत्र! तेरी माँग में धूल है जम गई,
तेरी चौखट पर साज़िश की सील है लग गई।
पर याद रखना—ये जनता चुप नहीं रहेगी,
सच की लौ फिर जलाकर तेरी नींव गढ़ेगी।









