
देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड) के कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू किए जाने की खबर ने एक बार फिर राज्य में संविदा पर कार्यरत गेस्ट टीचर्स के पुराने घावों को हरा कर दिया है। जहां एक ओर उपनल कर्मचारियों के लिए यह एक बड़ी राहत साबित हो सकती है, वहीं दूसरी ओर, 10 वर्षों से अधिक समय से शिक्षा की नींव को अपने श्रम और समर्पण से सींचने वाले हजारों गेस्ट टीचर्स अब भी सरकारी उपेक्षा का शिकार हैं।
उपनल कर्मचारियों को राहत, पर गेस्ट टीचर्स के भविष्य पर सस्पेंस
उत्तराखंड में करीब 22,000 से अधिक उपनल कर्मचारी अलग-अलग विभागों में सेवाएं दे रहे हैं। सरकार की ओर से इन्हें नियमित करने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है। यह फैसला यदि अमल में आता है, तो यह संविदा कर्मचारियों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, जिसकी लंबे समय से मांग की जा रही थी। लेकिन इसी के समानांतर, शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले गेस्ट टीचर्स के लिए अब भी सरकार की नीति अस्पष्ट बनी हुई है। लगभग एक दशक से भी अधिक समय से शिक्षण कार्य में लगे ये शिक्षक न तो नियमित किए गए हैं और न ही उन्हें किसी निश्चित सेवा श्रेणी में रखा गया है। क्या सरकार यह मान चुकी है कि शिक्षा सबसे कम प्राथमिकता का विषय है?
10 साल से ज़्यादा की सेवा, फिर भी न कोई दर्जा, न पहचान
राज्य के अलग-अलग ज़िलों में कार्यरत हजारों गेस्ट टीचर्स का कहना है कि उन्होंने कोरोना काल से लेकर संसाधनों की कमी तक, हर मुश्किल वक्त में बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। फिर भी उन्हें ‘अस्थायी’, ‘आवश्यकतानुसार’ या ‘मानव संसाधन’ जैसे अस्पष्ट वर्गों में डाल कर उनकी सेवाओं को स्थायित्व देने से लगातार बचा गया है। सरकार ने 10 साल बाद भी स्पष्ट नहीं किया है कि इन शिक्षकों को किस श्रेणी में रखा जाएगा — क्या इन्हें अतिथि शिक्षक ही माना जाएगा या कोई स्थायी रूप देने की मंशा है? इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति दोनों ही अस्थिर बनी हुई है।
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न्याय का सवाल – एक के लिए नीति, दूसरे के लिए अनदेखी क्यों?
गेस्ट टीचर्स संगठन का कहना है कि यदि उपनल कर्मचारियों को उनकी सेवाओं के आधार पर नियमित किया जा सकता है, तो गेस्ट टीचर्स को क्यों नहीं? आखिर एक शिक्षक जो रोज़ स्कूल जाकर बच्चों का भविष्य संवार रहा है, वह क्या किसी भी क्लर्क या कर्मचारी से कम महत्त्वपूर्ण है?
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“हमने 10-12 साल तक स्कूलों में काम किया है, बिना किसी स्थायित्व या सुरक्षा के। अब जब दूसरी श्रेणियों को नियमित किया जा रहा है, तो हमसे दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों?” – यह सवाल आज हर गेस्ट टीचर की ज़ुबान पर है।
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विरोध की तैयारी तेज़, शिक्षक संघ लामबंद
राज्य के विभिन्न जिलों में गेस्ट टीचर्स संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार जल्द से जल्द उनकी सेवा शर्तों को स्पष्ट नहीं करती और नियमितीकरण की प्रक्रिया नहीं शुरू करती, तो वे सामूहिक विरोध और धरना प्रदर्शन का रास्ता अपनाएंगे।
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एक शिक्षक नेता ने कहा, “हम सरकार से लड़ाई नहीं चाहते, लेकिन अगर एक वर्ग को न्याय मिल रहा है, तो दूसरे को क्यों नहीं? हमारे साथ 10 साल से अन्याय हो रहा है और अब हमें और चुप नहीं रहना है।”
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बहरहाल,उत्तराखंड सरकार के सामने यह सुनहरा अवसर है कि वह उपनल कर्मचारियों और गेस्ट टीचर्स, दोनों ही वर्गों के प्रति समान संवेदना और नीति दिखाए। यदि एक को उसका हक दिया जा सकता है, तो दूसरे को क्यों नहीं? गेस्ट टीचर्स और उपनल दोनों ही राज्य की व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। किसी को न्याय और किसी को अनदेखी देना न सिर्फ नैतिक रूप से अनुचित है, बल्कि प्रशासनिक असंतुलन भी पैदा करता है। अब देखना यह है कि सरकार इस असंतुलन को दूर करने की दिशा में ठोस कदम कब उठाती है।





