
राजीव कुमार झा
बिहार की ट्रेज़रियां देश की वित्त व्यवस्था का हिस्सा ही हैं । कलक्टर को ट्रेज़रियों के मार्फत झूठे भुगतान प्राप्त करने वाले की जानकारी होनी चाहिए ताकि इलियास हुसैन जैसे नेता कागजों पर अलकतरे के घोल में बालू को गर्म करके अपनी जेबों को फिर नहीं भर पाएं। नीतीश कुमार ने रिश्वत घोटालों में लिप्त मंत्रियों को कान पकड़ कर मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा देने का रास्ता अपनाया। लालू प्रसाद के काल में ऐसे मंत्री उनके सबसे अधिक निकट हुआ करते थे। केन्द्र सरकार ने लालू प्रसाद के चारा घोटाले के जांच की जब घोषणा की थी उस समय बिहार के गंदे राजनीतिज्ञों के कारनामों से देश वाकिफ नहीं था।
बिहार की ट्रेज़रियों से घोटालों में लालू प्रसाद के कार्य काल में अगर अवैध राशि की निकासी हो रही थी तो ऐसे वह वाकयों पर सख़्त सरकारी निगरानी भी क़ायम होनी चाहिए ताकि अगर राजद की सरकार बिहार में फिर बनती है तो ऐसे घोटालों से देश के खजाने की लूटपाट में संलग्न तत्वों से राजकोष को बचाया जा सके और आखिर बैंक लूटेरों में और ऐसे घोटालेबाजों में अब जनता को भी कोई फर्क नहीं करना चाहिए। सरकार के खजाने में जनता का पैसा है या फिर दूसरे देशों से कर्ज में जुटाई गयी राशि जमा है।
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आखिर ट्रेज़रियों की लूटपाट में शामिल नेताओं को बिहार एसटीएफ गोलियों से किस तरह और कहां उड़ाने जाएगी? वे किसी नहर के किनारे रुपयों की गड्डियों को लेकर असमंजस में बैठे अपराधी नहीं हैं और पुलिस की सुरक्षा में चैन की नींद सोते हैं। गिरफ्तारी के हालातों में उनसे उनके विशेष कारागार में उनके समकालीन अन्य गणमान्य नेतागण सहानुभूति का भाव लेकर दस्तक देते हैं। बिहार की जनता ने लालू प्रसाद के खिलाफ क्यों वोटिंग की मुहिम में शामिल हुई और क्या यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं है कि वह फिर अपनी किस्मत आगामी विधानसभा चुनावों में आजमाने जा रही है.








