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कविता : नदी की चादर… गूंजते रहे गीत मेरे यह घर द्वार सबका शीत की जलती अगन प्रेम की उठती लपट में घिर रहा जीवन शांत सरोवर के किनारे स्निग्ध धूप फैली नदी की चादर शाम के पास आकर… #राजीव कुमार झा
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जिंदगी सबकी
खुशी से कहती
यादों की छांव में
बहता झरना
तुम्हारे मन की
झलक से दूर
सबको रोज कहता
अब धूप में बादल
कहीं नहीं दिखता
ग्रीष्म में याद आती
सबको सरस धरती
अकेली अब कहीं
बैठी
बीते समय की
लालिमा में
सुबह का गीत
हवा गुनगुनाती
आती
दोपहर में अकेला
बना मन
याद आता सावन
तुम्हारे आंगन में
गूंजते रहे
गीत मेरे
यह घर द्वार सबका
शीत की
जलती अगन
प्रेम की उठती
लपट में घिर रहा
जीवन
शांत सरोवर के
किनारे
स्निग्ध धूप फैली
नदी की चादर
शाम के पास आकर
उदास हो गयी
सारी दिशाएं मटमैली









