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सामान्यजनों के साथ साथ तत्कालीन शासक बिंबसार तथा उसके पुत्र अजातशत्रु भी महावीर स्वामी के उपदेशों से प्रभावित हुए।महावीर स्वामी के उपदेश हमें जीवों पर दया करने की शिक्षा देते हैं। उन्होंने मानव समाज को एक ऐसा मार्ग बताया जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है। #सुनील कुमार, बहराइच (उत्तर प्रदेश)
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महावीर स्वामी का जन्म आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत के बिहार राज्य में वैशाली नामक गणराज्य के कुंडाग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला था। महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। ये अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे।इनके बड़े भाई का नाम नंदिन वर्धन तथा बहन का नाम सुदर्शन था।
जिस समयकाल में इनका जन्म हुआ भारतीय समाज में जाति-पाति, ऊंच-नीच की भावनाओं का बोलबाला था। समाज वर्णो- जातियों और उप जातियों में विभक्त था। समाज में विभिन्न प्रकार के धार्मिक अंधविश्वास और कुरीतियां प्रचलित थीं। प्रचलित कर्मकांड तथा जातिवाद के प्रति लोगों के मन में असंतोष व्याप्त था।जनसाधारण ऐसे वातावरण की घुटन से छुटकारा पाने के लिए बेचैन था।
महावीर स्वामी बचपन से ही बुद्धिमान, सदाचारी और विचारशील थे।वे जीवन-मरण ,कर्म,संयम आदि प्रसंगों पर सदैव सोचते तथा विचार-विमर्श करते थे। इनका बचपन राजमहलों में बीता। सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं फिर भी इनका मन महल में नहीं लगता था। यह सदैव गंभीर रहते थे। विभिन्न प्रकार के सांसारिक सुख होते हुए भी उनकी आत्मा में बेचैनी थी। महावीर स्वामी जब 28 वर्ष के थे तभी इनके माता-पिता का देहांत हो गया।
माता- पिता के देहांत हो जाने पर महावीर स्वामी ने सांसारिक मोह-माया त्याग कर अपने बड़े भाई नंदिन वर्धन से आज्ञा लेकर संन्यास ले लिया। तथा सत्य और शांति की खोज में निकल पड़े। महावीर स्वामी का मानना था कि कठोर तपस्या से ही मन में छिपे काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह को समाप्त किया जा सकता है।महावीर स्वामी ने 12 साल तक मौन तपस्या की और तरह-तरह के कष्ट झेले। अंत में उन्हें कैवल्य अर्थात पूर्णबोध प्राप्त हुआ।
वे नर से नारायण तथा आत्मा से परमात्मा बने।कठोर तपस्या के कष्टों को सफलतापूर्वक झेलने तथा इंद्रियों को अपने वश में कर लेने के कारण ही वे वर्धमान महावीर या जिन कहलाये।और इन्होंने जिस धर्म का प्रचार किया जैन धर्म के नाम से जाना जाता है। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ है दु:ख जीतने के पवित्र मार्ग को दिखाने वाला।ज्ञान प्राप्त के पश्चात महावीर स्वामी 30 वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार बड़े उत्साह से करते रहे। जगह-जगह जाकर जनकल्याण के लिए उपदेश देना शुरू किया।
धीरे-धीरे भारत के संपूर्ण राज्यों में जैन धर्म का प्रसार हो गया। महावीर स्वामी अपने जीवन के अंतिम क्षण तक जन-जन को दीक्षित करते रहे।देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूम-घूम कर भगवान महावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया।भगवान महावीर स्वामी अपने समय में जैन मत के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक और प्रवर्तक थे। महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को सत्य, अहिंसा, असत्य, अपरिग्रह, व ब्रह्मचर्य पांच व्रतों के पालन का उपदेश दिया।
इनके उपदेशों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करना चाहिए। सभी व्यक्तियों को अपने जीवन में अहिंसा का पालन करना चाहिए। अर्थात मन वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। अस्तेय का तात्पर्य है किसी भी प्रकार की चोरी न करना, किसी भी वस्तु को बिना उसके स्वामी की अनुमति के न लेना।अपरिग्रह का अर्थ है किसी भी वस्तु का आवश्यकता से अधिक मात्रा में संग्रह न करना।
ब्रह्मचर्य से तात्पर्य सभी प्रकार की वासनाओं को त्याग कर संयम का जीवन बिताना है।सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित जैन धर्म के त्रिरत्न हैं।सम्यक दर्शन से तात्पर्य सही बात पर विश्वास करना, सम्यक ज्ञान से तात्पर्य सही बात को समझना तथा सम्यक चरित्र से तात्पर्य उचित कर्म से है। महावीर स्वामी के उपदेशों व उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों,विधानों का जनमानस पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा।
सामान्यजनों के साथ साथ तत्कालीन शासक बिंबसार तथा उसके पुत्र अजातशत्रु भी महावीर स्वामी के उपदेशों से प्रभावित हुए।महावीर स्वामी के उपदेश हमें जीवों पर दया करने की शिक्षा देते हैं। उन्होंने मानव समाज को एक ऐसा मार्ग बताया जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है। जिस पर चलकर मनुष्य आज भी बिना किसी को कष्ट दिए हुए मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। धर्म का निरंतर प्रचार- प्रसार करते हुए 72 वर्ष की अवस्था में महावीर स्वामी ने आधुनिक बिहार राज्य में पावापुरी नामक स्थान पर कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया।जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा इनके निर्माण दिवस पर घर-घर दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाती…








