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व्यक्ति को हरे भरे वृक्षों की उस डाली के समान होना चाहिए जो झुक कर भी हमें मीठे फल देती है। अर्थात जीवन में नम्रता, दया, करूणा, ममता, वात्सल्य, प्रेम, स्नेह , मिलनसारिता, धैर्य और सहनशीलता का होना नितांत आवश्यक है। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान
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विलासितापूर्ण जीवन शैली के कारण इंसान आलसी होता जा रहा हैं। वही दूसरी ओर उसमें अंहकार व घमंड का भाव बढता जा रहा है। यही वजह है कि वह अपने सामने किसी को भी कुछ नहीं गिन रहा है जीवन में धन, बल, शक्ति से इंसान महान या बडा नहीं बनता है। बडा बनने के लिए ज्ञान और आदर्श संस्कारों का जीवन में होना नितांत आवश्यक है।
लासितापूर्ण जीवन शैली के कारण व्यक्ति परोपकारी नहीं अपितु विलासी व भोगवादी ही बनता हैं। जो परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए घातक प्रवृत्ति हैं और इंसान को इस तरह की जीवन शैली से बचकर रहना चाहिए।
जीवन में विलासितापूर्ण जीवन शैली नही अपितु परोपकार की भावना होनी चाहिए। व्यक्ति को हरे भरे वृक्षों की उस डाली के समान होना चाहिए जो झुक कर भी हमें मीठे फल देती है। अर्थात जीवन में नम्रता, दया, करूणा, ममता, वात्सल्य, प्रेम, स्नेह , मिलनसारिता, धैर्य और सहनशीलता का होना नितांत आवश्यक है। जो उक्त गुणों से परिपूर्ण होता है, वहीं समाज में महान कहलाता है।








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