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एक दिन माता-पिता कमरे में बातचीत कर रहे थे कि तभी शशिधर ने सुन लिया कि मां ने अपना हार बेचकर मुझे माउंट आबू भ्रमण हेतु भेजा था। बस उसी दिन उसने तय कर लिया कि वह मां के जन्म दिन पर उसे सोने का हार उपहार में देगा। वह दिन भी आ गया। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)
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शशिधर, सुनील, अनिल, मुकेश, अशोक एक ही स्कूल में साथ साथ पढते थे और पढने में काफी होशियार थे। हर वर्ष परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने की वजह से उन्हें छात्रवृत्ति मिलती थी जिसके कारण बिना बाधा के अध्ययन सुचारू रूप से चल रहा था। शिक्षा के दौरान स्कूल के विद्यार्थियों का कैम्प माउंट आबू भ्रमण के लिए जा रहा था, लेकिन शशिधर की आर्थिक स्थिति ऐसी नही थी कि वह कैम्प में जा सके।
उसने घर पर अपने माता-पिता को जब यह बात बताई तो पिता ने अपनी आर्थिक स्थिति के कारण जाने से मना कर दिया। लेकिन मां ने शशिधर से कहा जा बेटा, अपना नाम लिखवा दें शशिधर ने दूसरे दिन अपना नाम लिखवा दिया। इधर मां ने अपना सोने का हार चुपके से बेचकर उसके कैम्प की फीस भर दी। निर्धारित तिथि पर सभी माउंट आबू भ्रमण को गये। सप्ताह भर से वापस आये।
बेटे के चेहरे पर अपार खुशियां देखकर मां का दिल बाग बाग हो गया। उसे इस बात की खुशी थी कि शशिधर एक होनहार बेटा हैं और दिल लगाकर पढता हैं और उसकी मेहनत रंग जरूर लायेगी। समय कब पंख लगाकर उड़ जाता हैं। पता ही नहीं चलता हैं। प्रतियोगी परीक्षा के बाद शशिधर का चयन जिला कलेक्टर के पद पर हुआ। माता-पिता, गुरू जन फूले नहीं समा रहे थे।
एक दिन माता-पिता कमरे में बातचीत कर रहे थे कि तभी शशिधर ने सुन लिया कि मां ने अपना हार बेचकर मुझे माउंट आबू भ्रमण हेतु भेजा था। बस उसी दिन उसने तय कर लिया कि वह मां के जन्म दिन पर उसे सोने का हार उपहार में देगा। वह दिन भी आ गया। मां को उसने जन्म दिन पर सुन्दर सा सोने का हार वापस लौटा दिया और कहा, मां ! तुम कितनी अच्छी हो। मेरे लिए तूने अपना हार तक बेच दिया और हमें पता भी नहीं चला।
इस पर मां ने शशिधर को गले लगाते हुए कहा कि बेटा, आज तू जिस पद पर है उस पद के कारण हमारा सिर गर्व से ऊंचा हो गया। मां बाप को तो अपने बच्चों की तरक्की देखकर जो खुशी मिलती है, वैसी खुशी अन्यत्र मिलना मुश्किल है। बेटा, तूने आज मेरा सपना पूरा कर दिया। इससे ज्यादा हमें ओर कुछ भी नहीं चाहिए।








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