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पीपल की छाया, महक रही धान की बाली जीवन के जल से किसने सूखे खेतों को सींचा अकेले जो भी राहों में बढ़ते कभी नहीं वे पीछे चलते अपनी राहों में धूप छांव को सहते कभी पीपल की छाया में आकर उसको मन की बातें कहते… # राजीव कुमार झा
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सिर्फ तुम्हारे पास
कभी जब आता
यह मनमोहक मुस्कान
हमें बस भाता
अरी सुंदरी
रात में चंदा
किसको गीत सुनाता
जंगल में चांदनी की
बहार छायी
दसों दिशाओं में उजियारा
फैला
ग्रीष्म का सूखा चादर
मटमैला
जीवन का सूना घाट
नदी की सिमट रही
जो धारा
शाम की उसी दिशा में
अरी सुंदरी
आज उगा एक अकेला
तारा
कभी नहीं किसी शाम
वह हारा
अरी चांदनी
शाम की झिलमिल को
उसने बहुत पास से
आज निहारा
उसको चंदा प्राणों से
प्यारा
उसी झील का कोई
एक किनारा
चलो आज संध्या में बैठें
अपने मन की
कोई बहुत अकेली बात
यहां पर कर लें
अब अपनी यही डगरिया
सभी दिशा में बजे
बंसुरिया
कितनी दूर से
सागरतट पर आकर
लहरें
सबको गीत सुनातीं
बारिश के बाद
नदी बलखाती
वसंत ऋतु में
उसी धूप की याद
हमें अब आती
उसकी बहती धारा
शीत का ठहरा
जंगल का गीत सुनाती
आम के पेड़ों पर
तब आकर
वह सुरभित हवा
बुलाती
महक रही मन की
डाली
बेहद खुश बाग का
माली
यह खुशहाली
तुम लेकर आयी
कोयल कूक रही
मतवाली
सोने की महल अटारी
धूल भरी हवा भटकती
कदंब के पेड़ों की छांह
सुहाई
दुपहरी की बेला
बाग बगीचों में
ठंडी हवा चतुर्दिक छायी
सन्नाटे से भरा बरामदा
धूल धूप उड़ाती आयी
पेड़ की टहनी
तब चुप मुसकाती
उसी पहर
तब सफर हमारा
मानो बहती हो
प्रेमनदी में जल की
धारा
जाड़े के मौसम की
यादें
यह मन की मीठी आंच
हमारी
केशर कुसुम से
सजी फुलवारी
महक रही धान की
बाली
जीवन के जल से
किसने सूखे खेतों को
सींचा
अकेले जो भी राहों में
बढ़ते
कभी नहीं वे पीछे चलते
अपनी राहों में
धूप छांव को सहते
कभी पीपल की छाया में
आकर
उसको मन की बातें
कहते
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