चमोली | उत्तराखंड के चमोली जिले में आई आपदा ने एक परिवार को ऐसा जख्म दिया है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। नंदानगर ब्लॉक के सैंती कुंतरी गांव में जब बचाव दल ने मलबा हटाया, तो वहां का दृश्य देख सभी की आंखें नम हो गईं। मलबे के बीच एक मां अपने दोनों जुड़वां बेटों के साथ अंतिम सांस तक संघर्ष करती रही। बच्चे अपनी मां की छाती से लिपटे हुए मिले। तीनों की जान जा चुकी थी, लेकिन उनके आखिरी लम्हों का यह चित्र पूरे गांव और बचाव दल को दहला गया।
आधी रात को आया कहर
बुधवार-गुरुवार की दरम्यानी रात करीब दो बजे पहाड़ी से मलबा और पानी का सैलाब अचानक गांव पर टूट पड़ा। लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। कई मकान धराशायी हो गए। उसी में कुंवर सिंह का मकान भी दब गया। उस वक्त घर में कुंवर सिंह, उनकी पत्नी कांति देवी और जुड़वां बेटे विकास व विशाल (10 वर्ष) सो रहे थे।
बच गए पिता, लेकिन परिवार खत्म
सुबह जब एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें राहत-बचाव कार्य में लगीं तो उन्हें मलबे के नीचे से हल्की-सी आवाज सुनाई दी। यह आवाज कुंवर सिंह की थी। रोशनदान के खुले होने से उन्हें सांस लेने में मदद मिली और वे जिंदा बचे। उन्हें निकालकर तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन उनके दोनों बेटे और पत्नी मलबे में दबकर दम तोड़ चुके थे।
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मां की ममता का आखिरी रूप
बचाव दल ने बताया कि कमरे में जाकर जब बच्चों और मां को देखा, तो दिल दहल गया। लेंटर का बीम बच्चों पर गिरा था, लेकिन दोनों भाई मां की छाती से कसकर लिपटे हुए थे। मानो वे अपनी मां की गोद में ही अंतिम सुरक्षा तलाश रहे हों। जवानों ने बताया कि यह दृश्य इतना भावुक था कि दल का कोई भी सदस्य अपने आंसू रोक नहीं सका। शवों को बाहर निकाले जाने के बाद पूरा गांव सन्नाटे और शोक में डूब गया।
पीढ़ियों से दुख झेलता परिवार
इस आपदा ने केवल एक घर को ही नहीं, बल्कि पहले से ही विपत्तियों से घिरे एक परिवार को पूरी तरह उजाड़ दिया। गांव के बुजुर्ग जगदंबा प्रसाद और उनकी पत्नी भागा देवी अपने बच्चों और नाती-पोतों का सहारा थे। उनके चार बेटियां और एक बेटा था। लगभग दस साल पहले बेटे की मौत हो चुकी थी। बड़ी बेटी लक्ष्मी भी चार साल पहले चल बसी थी, जबकि उसके पति की मौत उससे दस साल पहले ही हो गई थी।
लक्ष्मी के बच्चे अंकित और दीपा की परवरिश नाना-नानी कर रहे थे। अंकित सेना में भर्ती हो गया, जबकि दीपा की पढ़ाई का खर्च भी वही उठा रहे थे। सबसे छोटी बेटी सोनी के पति का भी एक साल पहले निधन हो गया, जिसकी जिम्मेदारी भी बुजुर्ग दंपती पर आ गई।
अब इस आपदा ने जगदंबा प्रसाद और भागा देवी को भी लील लिया। परिवार के शोक में डूबे सदस्य कहते हैं कि “भगवान ने इतना बड़ा बोझ क्यों दिया?”
मुख्यमंत्री पहुंचे आपदा क्षेत्र
आपदा की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी प्रभावित क्षेत्र पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। सरकार की ओर से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता और पुनर्वास का भरोसा दिया जा रहा है।
गांव में मातम का माहौल
कुंतरी गांव में हर कोई सदमे में है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं—सभी के चेहरे पर सिर्फ आंसू और बेबसी है। गांव के लोग कहते हैं कि मां और बच्चों का यह दृश्य उनकी जिंदगी भर आंखों से नहीं हटेगा।
सवाल भी खड़े
- क्या पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी आपदाओं की पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर्याप्त है?
- क्या प्रशासन ने गांव वालों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की तैयारी की थी?
- और आखिर कब तक पहाड़ के लोग अपनी जानें इस तरह गंवाते रहेंगे?







