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रोगी व उसके परिजनों के लिए भी मजबूरी है सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के रिक्त पद, जांचों के लिए इधर-उधर भटकना या सुविधाएं न होना, ऐसी तमाम तरह की खामियों के चलते निजी अस्पतालों में जाना पडता। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)
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30 अप्रैल 2024 को समाचार पत्रों में यह समाचार पढ कर बेहद आश्चर्य हुआ कि भारत के 50 प्रतिशत अस्पताल नैतिक दिशा निर्देशों का पालन नहीं करते है। भारत में अस्पतालों और देखभाल के अन्य केन्द्रों में हर रोज मरीजों के साथ चिकित्सीय लापहरवाही बरती जा रही हैं। वही कोरोना काल में भी मेडिकल लापहरवाही के उदाहरण खूब देखने को आये।
चिकित्सा जैसे सेवा कार्य में घोर लापहरवाही मरीजो के जीवन के साथ कितना खिलवाड़ कर रही हैं यह भुगतभोगी रोगी व उसका परिवार ही जानता है। आज चिकित्सा जैसा महत्वपूर्ण विभाग लापहरवाही बरत रहा है और सरकार इनके लाइसेंस निरस्त नहीं कर रहीं है। यह कैसी विडम्बना है।
सरकार सब कुछ जानते हुए भी विवश है तो दाल में सब काला ही काला नजर आ रहा हैं। रोगी को देखने के बहाने मोटी फीस वसूलना, अनावश्यक दवाएं लिखकर कमीशन कमाना, अनावश्यक जांचे कर धन ऐंठना और बिना वजह रोगी को निजी अस्पतालों में भर्ती करना आज निजी अस्पतालों के लिए आम बात हो गई है। तभी तो हर साल इन निजी अस्पतालों की शाखाएं खुल रही है। एक मंजिल से दूसरी मंजिल व दूसरी से तीसरी मंजिल बन रही है। धी कमाई जो आ रही हैं।
रोगी व उसके परिजनों के लिए भी मजबूरी है सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के रिक्त पद, जांचों के लिए इधर-उधर भटकना या सुविधाएं न होना, ऐसी तमाम तरह की खामियों के चलते निजी अस्पतालों में जाना पडता। मेडिकल लापहरवाही की एक साल में 52 लाख शिकायतें यह बताती है कि रोगी जिन्हें धरती के देवता समझती है वे धरती के भगवान तो लुटेरे ही निकलें।
ऐसा सभी चिकित्सक व निजी अस्पतालों में देखने को भले ही दिखाई नहीं दे, किन्तु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है। अतः ईमानदार चिकित्सकों व अस्पतालों को ऐसे बेईमानी करने वालों का विरोध करते हुए उनके खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। यही वक्त की पुकार है।







