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हमारे संत महात्मा कथा के दौरान कहते है कि पता बन कर प्रभु के चरणों मे चढ जाओं।प्रभु का सुन्दर मन बन कर पुष्प के रूप में चढ जाओं। श्रेष्ठ कर्म रूपी फल व नेत्र के आंसू बन कर चढ जाओं। प्रभु से ऐसा प्रेम हो कि आंखों से आंसू छलक जाये। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान
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शब्द भी एक तरह का भोजन हैं। किस समय कौन सा शब्द परोसना है वो आ जाये तो दुनियां में उससे बढ़िया रसोइया कोई नहीं। जीवन में उतार चढाव आते ही रहते है लेकिन इससे घबराना नहीं चाहिए। बडा बनने के लिए बडे सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है। मन कमजोर होगा तो कभी भी जीवन में कामयाबी हासिल नहीं होगी।
हम आज जो भी कर रहे है। अपने मन की इच्छानुसार ही कर रहे हैं और इच्छा ज्ञान से जागृत होती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संकल्प के साथ आदर्श जीवन जीएं। अपने आपको समय के साथ अपडेट करते रहिए और जीवन के हर पल का महत्व समझना चाहिए। यह बात सही है कि जीवन में धन कमाना जरूरी है, लेकिन अनर्थ के माध्यम से धन कमाया जाता है तो जीवन निर्थक हो जाता है।
प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आकर समाप्त का नेतृत्व करने और राष्ट्र को शक्तिशाली व समृद्ध बनाने में हर नागरिक को योगदान देना चाहिए। बुराई को दूर करना आज के दौर की सबसे बडी जरूरत बन गई है। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में भारत के नव निर्माण के लिए समाज को सजग रहते हुए बौध्दिक व वैचारिक गुलामी से बाहर आना जरूरी है। जल, जंगल, जमीन और पशु पक्षियों इन सब की रक्षा करना हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। बच्चों में समाज के प्रति प्रेम भाव विकसित हो यह हम सभी का प्रयास होना चाहिए।
हमारे संत महात्मा कथा के दौरान कहते है कि पता बन कर प्रभु के चरणों मे चढ जाओं।प्रभु का सुन्दर मन बन कर पुष्प के रूप में चढ जाओं। श्रेष्ठ कर्म रूपी फल व नेत्र के आंसू बन कर चढ जाओं। प्रभु से ऐसा प्रेम हो कि आंखों से आंसू छलक जाये। प्रभु को धन दौलत, सोना चांदी नही चाहिए, अपितु अपने भक्तों का प्रेम स्नेह चाहिए। हम भगवान तो नहीं बन सकते, लेकिन श्रेष्ठ कर्म करके भगवान जैसा तो बन ही सकते है। जो व्यक्ति सहनशील होता है उस पर ईश्वर की बडी कृपा होती हैं। जहां समर्पण होता है, वहां शिकायत नहीं होती है।







