साहित्य लहर
कविता : क़ातिल

कविता : क़ातिल… सूखी धरती पर गरज – गरज कर शोर मचाता ठंडा मीठा जल बरसाता तुम्हें तृप्त कर देता दोस्त समझकर धूप में पानी की बौछारों को उसने क़ातिल बनकर तप्त धरा पर फेंका उमड़ पड़ी नदियां की धारा ग्रीष्म चतुर्दिक हारा बादल प्यार का सेहरा धरती पर लहराता #राजीव कुमार झा
धूप में बहता पानी
तुमको बहुत पास से
आकर कहता
बरसात में
बादल आकाश में
उड़ता रहता
वह सागर की लहरों से
उठता
मानो वह भी प्यासा हो
ग्रीष्म को
आकाश में आकर
घेर रहा हो
सूखी धरती पर
गरज – गरज कर
शोर मचाता
ठंडा मीठा जल बरसाता
तुम्हें तृप्त कर देता
दोस्त समझकर
धूप में पानी की
बौछारों को उसने
क़ातिल बनकर
तप्त धरा पर फेंका
उमड़ पड़ी
नदियां की धारा
ग्रीष्म चतुर्दिक हारा
बादल प्यार का सेहरा
धरती पर लहराता