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धन्य है वो परिवार जिस साहित्यकार के घर में उसकी संतान साहित्यकार के रूप में पैदा होकर अपने पिता की इस अमूल्य धरोहर को बचाये रखें और श्रेष्ठ साहित्य सृजन की इस श्रृंखला को निरन्तर बनाये रखें। श्रेष्ठ साहित्य सृजन कोई पेट भराई का जरिया नहीं है अपितु श्रेष्ठ साहित्य सृजन कर श्रेष्ठ विचारों को जन जन तक पहुंचा कर देश में आदर्श संस्कारों की पुनः स्थापना करना हैं. #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)
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स्त्री जो एक बच्चे की मां, पति की पत्नी, देवर की भाभी, सास ससुर की बहू कहलाती है जब वह अपने परिवारजनों के लिए भोजन व पकवान या अन्य स्वादिष्ट व्यंजन बनाती हैं तब वह अपना समूचा प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, लगन, ईमानदारी, निष्ठा, ममता, शांति व सद् भाव जैसे तमाम भावों को उसमें उढेल देती हैं जिससे वह भोजन या व्जंन स्वादिष्ट लगता हैं। यही वजह है कि हम कह उठते है कि मां के हिथों से बने भोजन का कोई मुकाबला नहीं है।
ठीक उसी प्रकार जब एक ईमानदार लेखक व साहित्यकार अपनी लेखनी से सकारात्मक सोच के साथ लिखता है तब उसमे रचनात्मक भावों के साथ ही साथ अपनी, अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की भी पीडा, उन्नति, प्रगति, उतार चढ़ाव का जिक्र अवश्य ही करता हैं। इसके लिए उस रचनाकार का मस्तिष्क शब्दों रूपी नदी में अनेक गोते लगाता हैं और नाना प्रकार के शब्दों का, वाक्यों का मंथन कर फिर एक समाजोपयोगी पढने योग्य एक श्रेष्ठ रचना आलेख, कविता का सृजन करता हैं।
लेखन कर्म कोई हलवा नहीं है या कोई सब्जी नहीं है कि इसे जैसे चाहे वैसे बनाकर इतिश्री खर ली जाए। रचनाकार अपनी रचना में अपने सुन्दर भावों को उड़ेलता है, तब एक श्रेष्ठ रचना का जन्म होता हैं। रचना दिमाग की उपज होती हैं। जिसे विचारों रूपी माला में पिरोकर पत्र – पत्रिका रूपी थाली में सुन्दर ढंग से सजाकर पाठकों को परोसा जाता है जिसके एक एक शब्द को पढ कर पाठक आनन्द लेता है और रचनाकार की लेखनी को श्रेष्ठ या निम्न स्तरीय बता कर उसकी सराहना या आलोचना करता हैं।
अतः लेखक, कहानीकार , कविगणों को चाहिए कि वे अपने विचारों को लेखन से पूर्व कहीं भी प्रकट न करें। चूंकि इस तकनीकी युग में अन्य लोग आपके श्रेष्ठ विचारों को चुराकर या कापी पेस्ट करके आप से पहले अन्यत्र रचना को प्रकाशित करा लेगे और आपके अमूल्य विचारों को अपने नाम से प्रकाशित करने में तनिक भी देरी नहीं करेंगे। आपके श्रेष्ठ विचार आपकी अमूल्य धरोहर है।
आपकी यह अमूल्य धरोहर तभी पुस्तक का रूप ले सकती हैं जब आपके ऊपर किसी प्रकाशक, साहित्य अकादमी, या भामाशाहों की कृपा हो अन्यथा आपकी संतान व परिजन भी आपकी इस अमूल्य धरोहर की कद्र करने वाली नहीं है। चूंकि सैनिक के घर में सैनिक, डाक्टर के घर में डाक्टर, वकील के घर में वकील, पत्रकार के घर में पत्रकार, शिक्षक के घर में शिक्षक पैदा हो सकता है लेकिन आपकी धरोहर को बचाये रखने के लिए लेखक, साहित्यकार के घर मे कभी भी साहित्यकार पैदा नहीं होता है। कहीं कोई अपवाद हो सकता है।
धन्य है वो परिवार जिस साहित्यकार के घर में उसकी संतान साहित्यकार के रूप में पैदा होकर अपने पिता की इस अमूल्य धरोहर को बचाये रखें और श्रेष्ठ साहित्य सृजन की इस श्रृंखला को निरन्तर बनाये रखें। श्रेष्ठ साहित्य सृजन कोई पेट भराई का जरिया नहीं है अपितु श्रेष्ठ साहित्य सृजन कर श्रेष्ठ विचारों को जन जन तक पहुंचा कर देश में आदर्श संस्कारों की पुनः स्थापना करना हैं और यह कार्य श्रेष्ठ साहित्यकार व आदर्श शिक्षक ही कर सकता हैं।









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