आपके विचार

रसोई पर मंहगाई की मार

नीरो की बंशी और मोदी की राजनीति...

सुनील कुमार माथुर 

सरकार एक ओर अपने आपको जनकल्याणकारी सरकार कहते नहीं थकती वहीं दूसरी ओर आये दिन हर वस्तुओं के दाम बढ़ा रहीं है। रसोई गैस पहले से ही पहुंच से दूर हो रही हैं वही दूसरी ओर आटे चावल जैसी खाध सामग्री पर जीएसटी लगाने से महिलाओं की रसोई का बजट डगमगा जायेगा। इससे दो वक्त की रोटी भर पेट खाना पकाना मुश्किल हो जायेगा। जिस देश की नारी को लक्ष्मी व अन्नपूर्णा की तरह पूजा जाता है उसी की रसोई पर जीएसटी के नाम पर टैक्स का भार लादना सरकार का मनमानी पूर्ण कृत्य ही कहा जा सकता है।

अतः जीएसटी खाधान्नों पर नहीं अपितु विलासिताओं की वस्तुओं पर लगाया जाये तो बेहतर होगा। पिछले कुछ वर्षो से मंहगाई जिस तरह से बढ़ी है उसने अब तक के सारे रेकार्ड तोड दिये है । जिस रफ्तार से मंहगाई बढ़ी उस रफ्तार से न तो आम आदमी की मजदूरी बढ़ी है और न ही वेतन बढा है लेकिन मंहगाई ने आम आदमी की कमर तोड दी। जनप्रतिनिधियों के वेतन व भत्ता बढाने के लिए सरकार के पास धन की कोई कमी नहीं है लेकिन जनता को सुविधाएं देने के नाम पर सरकार को खजाना खाली नजर आता हैं। आखिर यह दोगली नीति क्यों ? समस्या तो समाधान चाहती है न कि दलगत राजनीति।

नीरो की बंशी और मोदी की राजनीति…

आम से खास, सभी को पता है कि किस सामान में, किस काम में कितना जीसटी है। बिना जीएसटी के तो अब कुछ है ही नहीं, क्योंकि… गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स है। अब गुड्स है तो अच्छा ही होगा। एक फौजी अब चार साल में फौज के सारे नियम-कानून भी जान लेगा। अपने घर का खर्चा भी पूरा उठा लेगा और भविष्य की पूंजी को भी एकत्र कर लेगा। स्वयं की शादी-विवाह का खर्चा, माता-पिता का खर्चा, बहिन की शादी का जीसटी अर्थात दहेज भी इकट्ठा कर लेगा।

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चार साल में इतना सब कुछ करने के बाद जीएसटी भी भरेगा और आय कर, धन कर, उपहार कर, व्यय कर, ब्याज कर, पूंजी लाभ कर, प्रतिभूति लेन-देन कर, दस्तूरी कर, कॉर्पोरेट कर, बिक्री कर, सेवा कर, वर्धित मूल्य कर और भूमि कर में से जो-जो भरना है, वह भी भर देगा। वाह रे जीएसटी की बैसाखी लेकर देश का विकास करने चले महापुरूषों। अब किराये पर रहने वाले किरायेदार भी जीएसटी देंगे। दूध पीना है, दही खानी है, पनीर खाना है तो पहले जीएसटी दो। खाने पीने में तो जीएसटी आ ही गया है। बस अब थोड़ा समय ही बचा है कि मित्रों, हवा पर भी जीसटी न लगा दिया जाय। जिसको जितनी सांस लेनी है, उतना जीसटी भरना पड़ जाय।

मैं ‘‘अच्छे दिन ढाबा’’ में चाय पीने के लिए वहां बैठा तो मेरे बगल दो मित्र बैठे हुये थे, जो जीएसटी से संबंधित बात कर रहे थे। एक बोला, ‘‘अरे पूंजी राम सुन, मैंने सुना कि मार्केट में कोई जीएसटी नाम की व्यथा आई है। क्या है ये, क्या होता है इससे, किसने बनाया इसे…?’’ दूसरे व्यक्ति ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘अरे यार धन सिंह, कुछ नहीं है ये। मार्केट में पहले से ही बहुत कर तो थे ही। यह एक नया कर है, इसे गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स कहते हैं। इसे हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी की अगुवाई में मार्केट में भेजा गया है। जिससे कि मार्केट सही तरीके से चले और चोरी-चकारी न हो पाए।’’ पूंजी राम ने कहा, ‘‘अच्छा ये बात है, ये तो अच्छी बात है लेकिन अच्छा तो कुछ हुआ नहीं। राशन महंगा, फल-सब्जी महंगे, कुल मिलाकर जीवन जीना ही महंगा हो रहा है। खा-पीकर जो बच रहा था, वो भी अब बच नहीं रहा।’’

जैसे कि जलते हुये रोम को देखकर नीरो ने बंशी बजायी और रोम बर्बाद हो गया। उसी तरह महापुरूष नरेन्द्र मोदी राजनीति के तीर चला रहे हैं और भारतवर्ष बर्बादी के कगार पर खड़ा है। पैट्रोल महंगा, एलपीजी गैस महंगी, दाल-चावल मंहगे, फल-सब्जी महंगी और देश के महापुरूष राजनेता अच्छे दिन जी रहे हैं। बेरोजगारी की काली छाया जनता को घेरे हुये है और लघु-कुटीर उद्योगों को जीएसटी, बैंक, सीए और अन्य टैक्सों ने घेर के रखा हुआ है। अब क्या करे आम आदमी, क्या करे हमारे देश का किसान, क्या करे मजदूर वर्ग, क्योंकि अब तो रूखी-सूखी खाने के लिए भी हजार बार सोचना पड़ रहा है।

-सम्पादक

सरकार सरकारी सुख सुविधाओं व फिजूल की खर्ची पर रोक लगायें और जीएसटी के नाम पर लूट खसोट की राजनीति को समाप्त करें। आयें दिन टैक्स के बहाने जनता को लुटा जा रहा है जिससे देश की जनता आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है। एक ओर हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर अमृत महोत्सव मना रहे हैं और दूसरी ओर जनता जनार्दन को भारी टैक्स से लादा जा रहा है। दुःख की बात यह है कि देश की जनता आर्थिक बोझ से दबती जा रही है और नीरो चैन की व एशो आराम की बंशी बजा रहा है।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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सुनील कुमार माथुर

लेखक एवं कवि

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33, वर्धमान नगर, शोभावतो की ढाणी, खेमे का कुआ, पालरोड, जोधपुर (राजस्थान)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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